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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/७३

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५२ साहित्यालोचन वाते समान होती हैं, वहाँ कोई ऐसो भो संसनि जन्म देती है जिसमें एक भी गुण सब के जैसा नहीं होता। उसमें सभी माती में औरों से मिलना पाई जाती है। यह बात किसी निर्दिष्ट काल के किसी विशेष ग्रंथकार में भी हो सकती है। पर साधारणतः उस काल के अधिकांश ग्रंथकारों में कोई न कोई सामान्य गुण प्रायः होता ही है। इसी सामान्य गुण को हम उस काल की प्रकृति या भाव कर सकते हैं। हिंदी साहित्य का इतिहास ध्यानपूर्वक पढ़ने से बह विदित होता है कि हम उसे भिन्न मिष कालों में ठीक ठीक विभक्त नहीं कर सकते। उस साहित्य का इतिहास एक बड़ी नदी के प्रवाह के समान है जिसकी धारा उद्गम स्थान में तो बहुत छोटो होनी है, पर आगे बढ़कर और छोटे छोटे टीलो या पहाड़ियों के बीच में पड़ जाने पर वह अनेक धाराओं में बहने लगती है। बीच बीच में दूसरी छोटी छोटी नदियाँ कहीं सो आपस में दोनों का संबंध करा देती हैं और कहीं कोई धारा प्रबल येग से बहने लगनी हैं और काई मंद गति से कहीं खनिज पदार्थो के संसर्ग से फिसी धारा या जल गुणकारी हो जाता है और कहीं दूसरी धारा के गँवले पानी या दृषित वस्तुओं के मिश्रण से उसका जल स्पेय हो जाता है। सारांश यह कि जैसे एक ही उद्गम से निकलकर एक ही नदो अनेक रूप धारण करती है और कहीं पीनकाय सथा कहीं क्षीणकाय होकर प्रवाहित होती है और जैसे कभी कभी जल की एक धाराअलग होकर सदाअलग ही पनीरहती