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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/७५

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साहित्याटोन १४ विषय ही न मिलने लगा, जिस पर वे अपनी लेखनी चलाते। बात यहाँ तक विषड़ी कि कषियों को नायिका भेद और मथ- शिख आदि का वर्णन करने में ही अपनी सारी शक्ति लगाने में प्रयत्नशील होना पड़ा। इसी बीच में मुसलमानों को राज्यधारा के साथ विलासिता और श्रृंगार रसप्रियता का एक और नया प्रवाह उसमें आ मिला। इस प्रकार तीनटी छोटी भागों के मेल से बनी हुई एक बटुन बड़ी धारा ने कविता-सरिता के रूप में आकाश पाताख का अन्नर कर दिया। भावों की व्यंजना, विचारों का प्रत्यक्षीकरण, अंतःकरण का प्रतिनिय कविता में न झलकने लगा । बलवत लाए गए अलंकारी ने कधिता-नदी की कठिनता से अवगाहन योग्य बना दिया-उन्होंने उसे विशेष माटिल कर दिया । जो पहले भावव्यंजमा आदि के सहायक थे, वे अब स्वयं स्वामी बन बैठे। फल यह टुआ कि कविता की स्वागाबिक- ता ज्ञाती रही और यह अपने आदर्श आसन से गिर गई । कवि नाचिकाओं का रूप-वंग वर्णन करने में ही अपना कौशल विस्त्राने लगे। ये आंतरिक भादों की विवृसिन कर सफे, वे चरित्र चित्रण और भाषप्रदर्शन करना भूल गए । स्थूल दृष्टि के सामने जो कुछ आया, उसे शटवारघर से लपेटने में हो ये अपनो कथित्व शक्ति को चरम सीमा मानने लगे। इस प्रकार भिन्न भिन्न समयों में भिन्न भिन्न प्रभावों और कारणों के पंजे में पड़ कर साहित्य का रूप बदल- सा रहा पर कविता-सरिता की धाराएँ घरायर बहती हो रहीं। जिप्स काल में जो गुण या विशेषत्व धरता रहता है, वही