साहित्य का विषेचा उस काल की प्रकृति या भाव कहलाता है। यह भाव या प्रकृति को हम किसी निर्विए कास के कवियों की कृति के अध्ययन से निर्धारित कर सकते हैं। पर इस बात का हमें ध्यान रखना चाहिए कि हिंदी-साहित्य का इतिहास निर्दिष्ट कालों में कठिनसा से चाँटा जा सकता है। साहित्य का जो प्रवाह आरंभ से घहा, वह वहता ही गया । भिन्न भित्र कालों में उसके रूप में परिषर्तग तो हुआ, पर प्रवाह का मूल एक ही सा चना रहा। किसी निर्दिष्ट काल की प्रकृति जानन मै हमें कवि विशेष ही की कृति पर अवलंधित न होना चाहिए, चाहे यह कधि कितना ही बड़ा, कितना ही प्रतिभाशाली और काव्य-कला के शाम से किसमा ही संपन्न क्यों न हो। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह कवि भी नत्कालीन सामाजिक जीवन और सांसारिक परिस्थिति के प्रभाव से बचा नहीं रह सकता । उसकी सत्ता स्वतंत्र नहीं हो सकती। यह भी जाति के फमिक विकास की श्रृंखला के बंधन के यार नहीं जा सकता। यह बात ध्यान में रखने से ही हम उसके प्रज्यों के अध्ययन से जातीय विकास कामान प्राप्त करने में समर्थ हो सकते हैं। भूषण और हरिश्चन्द्र के ग्रन्थों का तुलनात्मक अध्ययन कर के हम जान सकते है कि उनके समयों की स्थिति और तत्कालीन जातीय सत्ता में कितमा अन्तर था। अतएव कवि अपने समय की स्थिति के सूचक होते हैं। उनकी कृतियाँ उनके समय का प्रतिनिब दिखाने में आदर्श का
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