सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/८

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

पर लोग कहते हैं कि जिस काम की मन को लगन होती है, कभी न कभी उसके साधन भी आपसे आए श्राकर प्रस्तुत हो जाते हैं। बस ठीक यही चात इस पुस्तकमाला के प्रकाशन के संबंध में भी हुई। प्रायः पाँच मास हुए, भदेय बाग श्यामसुंदर दास जी ने यों ही मुझसे अपनी इस नवीन पुस्तक 'साहित्यालोचने का जिक्र किया और उसकी कुछ हस्तलिखित प्रतिभी मुझे दिनलाई । बस ऐसी उत्तम और (हिंदी में ) अभूतपूर्व पुस्तक हंसकर उसे प्रकाशित करने का लोभ मैं संघरण न कर सका। मैंने अपनी यह इच्छा उरते डरते बाबू साहब पर प्रकट की। मुझे डर केवल इस बात का था कि पुस्तकमाला के प्रकाशन-काव्य में मैं समर्थ हो सकूँगा या नहीं। वायू साहब मुझ पर सदा से अष्टुत अधिक कृया रखते आए हैं और मुझे अपने छोटे भाई के समान मानते आए हैं। आपने तुरंत बिना कुछ पूछे मेरी प्रार्थना स्वीकृत कर खी और मुझे इस पुस्तक के प्रकाशन की व्यवस्था करने को आशा ची। मैंने भी ज्यो त्यो सब प्रबंध करके इस ग्रंथात से अपनी साहित्य-रख-माला का आरंभ कर दिया है। मैं यह है कि इस माला में आगे भी इसी कोटि के अष्ट और स्थायी ग्रंथ प्रकाशित हो और यह माला उच्च स्थान प्राप्त कर ले: पर इस आशा की पूर्ति हिंदी साहित्य के मर्मज्ञ विद्वानों और गुणग्राहक पाठको की कमा पर ही अव- संबित है। चाहता मो वी-संसार में एक