साहित्य का विवेचन कयि की कृति की अंतरात्मा पर, चाहे उस पर उसकी व्यकि- गन सत्ता की लाप कितनी ही गहरी क्यान पड़ी हो, जस काल की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और मानसिक स्थिति का प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता, जैसे ही उसकी रचना का बाहरी रुप भी उसके प्रभाव से नहीं बच सकता। इस सिद्धांत को स्पष्ट करने के लिये हम उदाहरणवन् लन्नू सास और हरिश्चंद्र के गद्य उपस्थित करते है। इन दोनों के गध को ध्यानपूर्वक पाकर विवेकशील पाठक स्पष्ट देख सकते हैं कि दोनों को लेखन-शैली में कितना अंतर है। यह सब है कि लालूलाल ने ब्रज भाषा के पय और वनमंडल को यौली का सहारा लेकर गध लिसने का प्रयत किया है और, हरिचंद्र को लल्लूलाल के पीछे के और अपने से ७-20 वर्ष पहले के गय के विकसित रूप का सहारा मिला है। पर यहाँ हमारा उद्देश्य उन कारणों पर विचार करना नहीं है जिनस इन दोनों के गय में इतना अंतर हो गया है। हम तो केवल यह दिखाना चाहते हैं कि दोनों की गद्य-शैलो ने फिस तरह भिन्न भिन्न रूप धारण किए । लबूलाल की कृति बहुत पहले की है, उस पर कविता का प्रभाव स्पट रूप से दिखाई देता है। उस समय तो वह अपना रूप स्थिर करने में खगी हुई थी, पर हरिश्चंद्र के समय में उस रूप में कुछ कुछ स्थिरता आ गई थी। वह परिमार्जित हो चली थी, उसमें प्रौढ़ता और शक्ति- संपन्नता के खिह दिगमाई देने लगे थे, वह भाषच्यंबना में अधिक समर्थ हो चली थी। उसी रूप से अनुमाणित और प्रभायान्वित
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