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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/८७

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साहित्यासोचन के अनुसार प्रस्तुत की गई कृतियों के अध्ययन के संबंध में ही विचार करना है। हमें तो यही देखना है कि इस शाला की सहायता से आनंद का उठेक करने में काव्य कहाँ तक समर्थ होता है। साहित्य-शास्त्र के नियम काव्य-रचना के सहायक मात्र है। ये काश्य के आधार नहीं। काव्य के मूल रूप की सत्ता उनसे आग और स्वतंत्र है। इस बात को भूलकर साहित्य- शास्त्र का विश्लेषण ही अपना मुख्य कर्तव्य मान लेना, मामी किसो उद्यान की सुंदरता का अनुभव न करके यह बात जानने में लग जाना है कि माली ने किन किन नियमों के परिपालन से उसे सुंत्रता का रूप दिया है। साधारण लोगों के लिये तो उस सुंदरता का अनुभव करना ही मुख्य बात है: माली की कला का विवेचन गौण है। इसी प्रकार मानय-वड्य परः ललित- कक्षाओं का जो प्रभाव पड़ता है और उसके कारण आनंद का जो अनुभव होता है, वही मुगय है, और वही जानना भी चाहिए। रहा इस वान का मानना कि फिन फिन उपायों का अवलंबन करके कौन कला सफल और उन्नत हो सकी है, गीण पात है। हाँ. जो किसी विशेष कला का शान माप्त करना चाहते हो अथवा जिनमें सहज प्रतिभा वर्तमान हो, वे उस कला के नियमों और सिज्ञांतो का अध्ययन करके उसका प्लांत मान प्राप्त कर लेने पर अपने को विशेषन बना सकते हैं। जैसे किसी तैयार की हुई वस्तु और उसके तैयार होने की विधि में जो अंतर है, यही काव्य और साहित्य-शास्त्र में भी अंतर है। यह दूसरी भात