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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/९४

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कविता का विवेचन म्याल्याता जीवन के संबंध में अपने जैसे विचार स्थिर करता है, उन्हीं का स्पष्टीकरण काव्य है। अञ्च प्रश्न थह होता है कि जीवन की साया में वह कौन सा नत्व है जो उसे कचितामय बनाता है । 'कवितामय' शब्द से हमारा तात्पर्य रागात्मक और कल्पनात्मक है। अर्थात् जिस याक्य में कल्पना और ममीवेगों का बाहुल्य हो, यह कषिता काहसावेगा। इस विचार से यदि किसी यक्ति, पुस्तफ, चित्र या विचार में हम हम दोनों तत्वों को स्पष्ट देने, तो उसे हम कषितामय कह देगे। अतएच जीपन की कवितामय व्यास्था से हमारा सान्पर्य जीवन की उन घट- नाओं, अनुभवों या समस्याओं से होता है जिनमें रागात्मक या कल्पनात्मक तत्वों का बाहुल्य हो । कविता की या विशेषता है कि जीवन से संबंध रखनेवाली जिस किसी बात से उसका संसर्ग होगा, उसमै मनोग अवश्य वर्तमान होंगे;नया कल्पमा- शक्ति से वह प्रस्तुत सत्ता को काल्पनिक सत्ता का और काल्प- निफ सत्ता को वास्तिविक सधाका रूप दे देगी । इसका तात्पर्य यह है कि पर तो कविता में मनोवेगों (भाया) और रागों की प्रचुरता होगी; और दूसरे कल्पना का प्राबल्य इतना अधिक होगा कि वास्तविक वस्तुएँ करपनामय बन जायेगी; और जो कल्पनामय है, अर्थात् जिनकी उत्पत्ति कषि के अंतःकरण में हुई है, वे वास्तविक जान पड़ने लगेगी। परंतु केवल रहीं दोनों गुणों के कारण कविता का स्वरूप स्थिर नहीं होगा। इम यह नहीं कह सकते कि जहाँ मनोवेगों