७५ कविता का विषेपन चाहिए कि कविता की अस्तरात्मा अपने वाय रूप के बिना ही वर्तमान है; और जहाँ केवल वृत्त हो, वहाँ समझना चाहिए कि उसका वा रूप, अन्तरात्मा के विना, खड़ा किया गया है। सारांश यह है कि कविता में, वास्तविक कविता में, बाह्य रूप और अन्लामा दोनों का पूर्व संयोग आवश्यक और अनि- घार्य है। कुछ लोगों का कहमा है कि कथिता के लिये वृत्त की आ- वश्यकता नहीं है। उनका कहना है कि पृप्त एक प्रकार का परि- धान है: यह कविता का भूषणा है, उसका मूल तन्य कविता नहीं है, उसके बिना भी कविता हो सकती है और हुई है। यह सच है कि गा मैं भी कविता के लक्षण उपस्थित रह सकते हैं। पर यह कविता नहीं है, यह गया है। यह और बात है कि हम उसमे उन गुणों की विशेषता देखकर उस “षितामय गद्म" की उपात्रि द पर है वह वास्सम में गध हो । बिना वृत्त के कविता न आज तक कहीं मानी गई है और न मानी जाती है। फिर यह बात भी विचारणीय है कि मानव जीवन में संगीत का भी एक विशेष स्थान है । प्रकृति ही संगीत- भय है। मंद मंद वायु के संचार, भरनों की कलकल ध्वनि, पत्तो को सरसराहट नदियों के प्रवाह पक्षियों के कतरब, यों तक कि समुद्र-गर्जन में भी संगीत है जिससे मनुष्य की आत्मा को आनंट और सन्तोष प्राप्त होता है। इसे कविता से अलग करना मानों उसके रूप, उसके महत्व और उसके प्रभाव को
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