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क्ध्याय १३ big टिप्पणियाँ
संरस्वती, दिसंबर, १९०१; मि० बं० वि०, प्र० सं० की भूमिका, पृ० १ पर उद्धृत (द्वि० सं० में दी हुई प्र ० सं० की भूमिका के अनुसार पृष्ठ-संख्या का निर्देश है और मि० बं० वि० के संबंध में सत्र ऐसा ही समझें) ।
मि०बं० वि०, प्रं० सं०, भूमिका, पृ० ४।
उपरिवत्, पृ० २१।
उपरिवत्, पृ० १।
“इसमें इतिहास ही का क्रम रखने एवं इतिहास संबंधी सामग्री सन्निविष्ठ रहने के कारण हमने इसका उपनाम हिंदी साहित्य का इतिहास' तथा 'कवि-कीत्तन” भी रखा है ।” उपरिवत्, पु० ४।
उपरिवत्, पृ० ३।
श्यामविहारी मिश्र, एम्ू० ए०, और शुकदेवविहारी मिश्र, बी० ए० थे।
मि० बं० वि०, प्र० सं०, भूमिका, पृ० २७।
उपरिवत्, पृ० १२।
उपरिवत्, पृ० १६ ।