सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:साहित्य का इतिहास-दर्शन.djvu/१०१

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

és साहित्य का इतिहास-दर्शन

(x)

हि का सर्वश्रथम सुव्यवस्थित साहित्यिक इतिहास आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी शब्दसागर की विद्यद भूमिका के रूप में प्रस्तुत किया । साहित्यिक इतिहास का उनका विभावन इन पंक्तियों में बड़ी निशचयात्मकता के साथ व्यक्त हुआ है--“जब कि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का स्थायी प्रतिबिंब होता हैं, aa यह निदिचत है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवत्तंव होता चला जाता है । आद्रि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परंपरा को परख़ते हुए साहित्य-परंपरा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही 'साहित्य का इतिहास' कह- लाता है | जनता की चित्तवृत्ति बहुत कुछ राजनीतिक, सामाजिक, सांप्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है । अतः कारण-स्वरूप इत परिस्थितियों का किचित्‌ दिग्दर्शन भी साथ ही साथ आवश्यक होता है । इस दृष्टि से हिंदी साहित्य का विवेचन करने में यह बात ध्यान में रखनी होगी कि किसी विशेष समय में लोगों में रुचि-विशेष का संचार और पोषण किधर से और क्रिस प्रकार हुआ । उपर्युक्त व्यवस्था के अनुसार हम हिंदी साहित्य के ६०० वर्षों के इतिहास को चार कालों में विभक्‍त कर सकते हें--

आदि-काल (वीरगाथा-काल, सं० १०५०-१३७५) पूर्व-मध्य काल (भक्ति-काल, सं० १३७४५-१७०० ) उत्तर-भध्य काल (रीति-काल, सं० १७००-१६००) आधुनिक काल (गद्यकाल, सं० १६००-१६५४) ।

शब्दसागर में लिखित हिंदी साहित्य का विकास” को, परिवत्तित' तथा परिमाजित कर, उन्होंने १६९२७ में हिंदी साहित्य का इतिहास” के रूप में प्रकाशित किया । उसके 'काल- विभाग” शीर्षक प्रारंभिक परिच्छेद में उन्होंने उपर्युक्त सिद्धांत और पद्धति की ही पुनरावुत्ति की है, जिनका निर्वाह करने की क्षमता का भी परिचय देने में वे समर्थ सिद्ध होते हे । शुक्ल जी ने स्वकालीन पादइचात्य वैदुप्प की उपलब्धि को, विलक्षण सजगता का परिचय देते हुए, हिंदी साहित्येतिहास के निर्माण के लिए, अपना लिया है-कदाचित्‌ किसी भी भारतीय भाषा के साहित्य के इतिहास-लेखक के पूर्व । उन्नीसवीं शताब्दी में पद्चिम में साहित्येतिहास के क्षेत्र में जो विधेयवाद प्रचलित था, उसका सविस्तर विवरण हम दे चुके हैं । शुक्ल जी ने इसी विधेय- बाद को, उस समय के लिए आइचर्यजनक नव्यवादिता के साथ, अधिकृत और व्यवहृत किया- उन्हीं शुक्ल जी ने, जो काफी पुराने पड़ गये रोमांटिक कवियों के हिंदी अनुयायियों, छाया- वादियों, से कम ही सहानुभूति दिखातें हे और, 'किमाश्चर्यमत: परं', उनमें से कुछ पर तो क्युमिग्ज जैसे अँगरेजी के उन कवियों के प्रभाव का भी संदेह करते हैं, जिनका नाम भी उन कवियों ने जाते कितने दिनों बाद सुना होगा ! कितु शुक्ल जी रचनात्मक साहित्य में जिस नवीनता के विरोधी हे-उनके साथ न्याय किया जाय, तो कहना पड़ेगा कि उनत्तका अपना रचनात्मक साहित्य भी उनके आदर के अनुरूप अवश्य है !-उसे साहित्येतिहास तथा साहित्यालीचन के क्षेत्र में उनकी जैसी तत्परता के साथ अपनानेवाले आज भी हिंदी के कुछेक विद्वान्‌ ही मिलेंगे । रिचर्ड्स और क्रोचे के सिद्धांतों का उल्लेख ही नहीं, उनका खंडन भी करनेवाला यह व्यक्ति भारत तो कया, पश्चिम के भी समकालीन दो-चार ही विद्वानों में एक रहा होगा !