8६ साहित्य का इंतिहास-दर्शन
(८)
हमारी उपर्युक्त आशंका का आधार हिंदी के असंख्य छोटे-बड़े साहित्येतिहास हैं, और इसकी पुष्टि होती है नागरी-प्रचारिणी सभा की हिंदी साहित्य के बृहत् इतिहास की योजना से । उन ग्रंथों का उल्लेख यहाँ अनावव्यक है, जो विवरण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होते हुए भी'- विशेषतः अनेक शोध-ग्रंथ-पद्धति में शुक्लजी के इतिहास से भिन्न नहीं हे । कितु यहाँ हम कुछ विस्तार से बृहत् इतिहास पर विचार कर सकते हैं ।
एक परिपत्र में, जो संपादकों तथा उपसंपादकों के मार्ग-निर्देश के लिए प्रचारित हुआ है, कहा गया है-/एकरूपता के उद्देश्य से ही संपादक-मंडल ने कुछ सामान्य सिद्धांत' और पद्धति” का निर्धारण किया है ।”
सामान्य सिद्धांत ये हें-
(१) “हिंदी साहित्य के विभिन्न कालों का विभाजन युग की मुख्य सामाजिक और साहित्यिक प्रवृत्तियों के आधार पर किया गया है ।
(२) व्यापक सर्वांगीण दृष्टि : साहित्यिक प्रवृत्तियों, आंदोलनों तथा प्रमुख कवियों और लेखकों का समावेश इतिहास में होगा और जीवन की सभी दृष्टियों से उन पर विचार किया जायगा ।
(३) साहित्य के उदय और विकास, उत्कर्ष तथा अपकर्ष का वर्णन और विवेचन करते समय ऐतिहासिक दृष्टिकोण का पूरा ध्यान रखा जाय । अर्थात् तिथि-क्रम, पूर्वापर तथा कार्य- कारण-संबंध, पारस्परिक संपर्क, संघर्ष, समन्वय, प्रभाव, ग्रहण, आरोप, त्याग, प्रादुर्भाव, अन्तर्भाव,' तिरोभाव आदि प्रक्रियाओं पर पूरा ध्यान दिया जाय ।
(४) संतुलन और समन्वय : ऐसा ध्यान रखा जाय कि साहित्य के सभी पक्षों का समुचित विचार हो सके । ऐसा न हो कि किसी पक्ष की उपेक्षा हो जाय और किसी का अति- रंजन । साथ-ही-साथ साहित्य के सभी अंगों का एक दूसरे से संबंध और सामंजस्य किस प्रकार से विकसित हुआ, इसे स्पष्ट किया जाय। उनके पारस्परिक संघर्षों का उल्लेख और प्रतिपादन उसी अंश और सीमा तक किया जाय, जहाँ तक वें साहित्य के विकास में सहायक सिद्ध हुए हों ।
(५) हिंदी साहित्य के इतिहास के निर्माण में मुख्य दृश्ष्टकोण साहित्यशास्त्रीय होगा। इसके अंतर्गत ही विभिन्न साहित्यिक दृष्टियों की समीक्षा और समन्वय किया जायगा । विभिन्न साहित्यिक दृष्टियों में निम्नलिखित की मुख्यता होगी -
(१) शुद्ध साहित्यिक दृष्टि-अलंकार, रीति, रस, ध्वनि, व्यंजना भादि ।
(२) दाहनिक ।
(३) सांस्कृतिक ।
(४) समाजशास्त्रीय ।
(५) मानववादी आदि |
(६) विभिन्न राजनीतिक मतवादों और प्रचारात्मक प्रभावों से बचना होगा । जीवन में साहित्य के मूल स्थान का संरक्षण आवद्यक होगा ।