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पृष्ठ:साहित्य का इतिहास-दर्शन.djvu/१२५

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११३ साहित्य का इतिहास-दर्शन

(४) हिंदी में संवत्‌ १७०० के पूर्व उनकी स्थिति और स्वरूप । अध्याय २- भाग-चित्रण (१) काव्यवर्णित प्रेम- रति का रूप । (क) आस्तिक-अ्रधान । (ख) साधना-प्रधान | (ग) भावात्मक । (घ) अभिलाष-प्रधान। (2) स्वच्छंद । (a) निर्भीक । (छ) सहज । (ज) उदात्त । (४) अनुभूतिमय । (२) प्रेम का वेषम्य-श्रीमद्भागवत और फारसी काव्य का प्रभाव । (३) नाता मनःस्थितियों का चित्रण । (४) परस्परविरोधी भावों की योजना-जैसे देन्य,उत्साह,आशा-निराशा, उन्माद-चेतना । (x) भावों की अन्तदंशाएँ । (६) भावों की सूक्ष्तता । (७) अनुभाव-चित्रण । नानाचेष्टाओं और हारीरिक अवस्थाओं की योजना । (५) वियोग की प्रधानता और उसका कारण । (६) प्रकृति-वर्णन-वियोगोत्तेजक । (१०) अभिलाष का महत्त्व और रूप । (११) लौकिक प्रेम का अलौकिक प्रेम की ओर भुकाव-विभिन्न दाशनिक संप्रदायों का प्रभाव । अध्याय ३- भारतीय प्रेम-अ्रबंध (१) प्रेमकथाओं की भारतीय परंपरा | (२) नायक-नायिका का रूप । (३) नायिका में प्रेम की प्रधानता । (४) नायक में प्रेम की पुष्टि में कत्तंव्य की प्रमुखता । (५) समाज का रूप । (६) सर्गबद्धता का अभाव । (७) स्वच्छंदता की अमृखता । (5) काव्य का रूप । (६) भाषा और हैली । अध्याय ४- सूफी प्रेम-प्रबंध (१) सूफी प्रेम-प्रबंधों की विद्येषताएँ । (२) प्रेम का स्वरूप । (३) प्रेम का प्रत्यक्ष स्फुरण नायक में । (४) नायक में प्रेम व्यक्तिगत हित तक ही परिमित । , (५) लौकिक प्रेम की ईइवरीय प्रेम में परिणति ।