(६) (७) (5) (६)
अध्याय १३ ११३ काव्य का रूप । वियोग की प्रधानता ।
वस्तु-विभाजन का प्रकार | भाषा और होली
अध्याय ५- मुक्तक रचनाकार
(१) (२) (३) (४) (५) (६)
व्यक्तिगत प्रेम और भक्ति का समन्वय । प्रेम की गहराई ।
वियोग का चरमोत्कष॑।
प्रेम की नाना अवस्थाओं की अनुभूति । अभिलाष और वेदना की गंभीरता । भाषा पर अधिकार |
अध्याय. ६- भाषा और हौली
(१)
(२)
भाषा (क) नागर और साहित्यिक एवं पूर्णतः परिष्कृत ।
(ख) मुहावरों और लोकोक्तियों की सजीवता ।
(ग) लाक्षणिक विशुद्ध ब्रजभाषा ।
(a) नवीन शब्दों का निर्माण ।
(ड) ध्वन्यात्मक डब्दों का प्रयोग ।
(च) नामधातु तथा क्रियात्मक संज्ञाओं का प्रयोग ।
(छ) श्ंगाररसानुकूल कोमल-कांत ब्रजभाषा, अर्थंगर्भ तथा प्रवाहशील । (ज) लक्षणा और व्यंजना का चमत्कार ।
(झ) व्याकरण-व्यवस्था ।
शैली
(क) भावों का साक्षात् वर्णन ।
(ख) अतिरंजना की प्रवृत्ति ।
(ग) रहस्य-भावना के दर्शन ।
(a) उक्ति की वतक्रता, उसका स्वरूप ।
(s) अचेतन में चेतनत्वारोप ।
(च) नाम का प्रयोग ।
(छ) आत्मनिवेदन की प्रवृत्ति ।
अध्याय ७- छंद और अलंकार (क) छंद-विधान
(ख)
(१) रसानुकूल छंदों का प्रयोग ।
(२) घनाक्षरी और सवैयों की प्रधानता ।
(३) उनके रूप और भेद ।
(४) उनके इतिहास ।
(x) अरिल्ल, ताटंक, त्रिभंगी आदि छंदों का प्रयोग । अलंकार-विधान
(१) प्रयोगों की कल्पना ।
(२) उपमान-योजना में व्यक्तित्व की भूलक । (३) प्रभाव का साम्य तथा मनोवैज्ञानिकता ।