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पृष्ठ:साहित्य का इतिहास-दर्शन.djvu/१४

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अध्याय १
इतिहास-दर्शन : भारतीय दृष्टिकोण

प्राच्य-विद्या-विशारद पाश्चात्यों के अनुसार प्राचीन भारतीयों ने अपने अतीत का इतिहास प्रस्तुत नहीं किया, उनमें ऐतिहासिक विवेक था ही नहीं।[१] हम जब आज के इतिहास-ग्रंथ देखते हैं, तो हमारे मन में भी क्या कुछ ऐसा संदेह उत्पन्न नहीं होता?

किंतु इतिहास से तात्पर्यं क्या है? कार्लाइल का इतिहास विषयक जीवनी मूलक विभावन (Conception); या रोशर, एवेनेल, मेकॉले का सार्वभौम; फ्रीमैन, सीली का राजनीतिक; लार्ड ऐक्टन का राजनीतिक; मार्क्स का भौतिकवादी; लैंप्रेख्त का मनोवैज्ञानिक; अथवा डॉलिंगर का धार्मिक विभावन? ये सभी इतिहासकार आधुनिक युग के हैं। इतिहास के संबंध में इनके विभावनों में तात्त्विक अंतर हैं। इनमें से हम किसे वह कसौटी मानें जिसपर प्राचीन भारतीयों के वैसे प्रयासों को परखा जाय, जिन्हें अपने यहाँ अत्यंत प्राचीन काल से 'इतिहास' कहने की परंपरा चली आई है?

इतिहास विषयक विभावन से भिन्न इतिहास-संबंधी आधारभूत सामग्री का भी प्रश्न है? क्या उसपर प्राचीन भारतीयों ने ध्यान दिया था? इस संबंध में भी हमारी ऐसी धारणा हो चली है कि प्राचीन भारतीयों के प्रयत्न अव्यवस्थित, अपूर्ण और सदोष हैं।

पहले हम भारतीय इतिहास की आधारभूत सामग्री पर ही विचार करें, भारतीयों के, इतिहास विषयक विभावन और दृष्टिकोण का विश्लेषण बाद में ही उचित होगा। तिथि क्रम और भूगोल इन दोनों को इतिहास की दो आँखें माना गया है। इनमें से जहाँ तक प्रथम, तिथि क्रम का प्रश्न है, पुराणों में राज-वंशों, उनके समय और राजत्व-काल के स्पष्ट और निश्चित उल्लेख मिलते हैं। जिसे आधुनिक विद्वान् प्रागैतिहासिक कहते हैं, उस काल से लेकर ऐतिहासिक युग तक की विस्तीर्ण अवधि के समस्त राज-वंशों की तिथि-क्रमानुसारी जो तालिकाएँ पुराणों में सुलभ हैं, उनके अभाव में, प्रत्नतात्त्विक तथा मुद्राशास्त्रीय साक्ष्य की प्रचुरता के बावजूद, प्राचीन भारतीय इतिहास का पुनर्निर्माण असंभव सिद्ध होता। भारतीय इतिहास के पाश्चात्य इतिहासकारों ने, पुराणों को अविश्वास्य घोषित करते हुए भी, इन्हीं के आधार पर राजाओं के नाम और उनका राजत्व-काल निर्धारित किया है। पार्जिटर के द्वारा पुराणों से संकलित ऐसी सामग्री का महत्त्व निर्विवाद है, यद्यपि इस विद्वान् ने भी सामान्य रूप से यह कह डाला है कि प्राचीन भारत ने हमें इतिहास ग्रंथ नहीं दिये हैं।[२]

फिर भी पार्जिटर यह स्वीकार करता है कि पुराण आदि ग्रंथों में परंपरा प्राप्त विपुल 

टिप्पणियाँ

१. ^ (क) 'History is the one weak point in Indian literature. It is in fact non-existent. The total lack of historical sense is so characteristic that the whole course of Sanskrit literature is darkened by the shadow of this defect, suffering as it does from an entire absence of chronology."

—Macdonell: Sanskrit Literature. १०।


(ख) 'Ancient India has bequeathed to us no historical works.'

—Pargiter: Ancient Indian Historical Tradition., पृ॰ २।


(ग) यही भूल अरबी यात्री अलबेरूनी ने की थी। १०३० ई॰ में भारत पर लिखित अपनी पुस्तक में वह कहता है—
'Unfortunately the Hindus do not pay much attention to the historical order of things, they are very careless in relating the chronological succession of their kings and when they are pressed for information and are at a loss, not knowing what to say, they invariably take to romancing.'

—E. C. Sachau: Alberuni's India, पृ॰ १०।

२. ^ दे॰ १ (ख)।