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पृष्ठ:साहित्य का इतिहास-दर्शन.djvu/२३८

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अध्याय १३ २२७

[४०० ]

वाहिद कवि fro, stare ata | [5०१ ] , वजहन ग्रि०, शांत-रस के वेदांत-संबंधी दोहों के रचयिता ।

[ ८5०२ ] aga स०, बारामासा । [ ८०३ ] « सृथवेबसिश्र स०, कंपिलावासी, १७२८ वि०, वृत्तविचार, छंदविचार, फाजिलअलीप्रकाश, अध्यात्म-

प्रकाश और दणरथराय; ग्रि०, कविराज, कंपिला के, १७०० ई० के आसपास उपस्थित; काव्य- निर्णय, सत्कविगिराविलास, सुन्दर्रीतिलक ।

[ s0¥ ] सुखदबसिञश्र कवि २ स०, दौलतपुर, जिला रायबरेलोवाले, १८०३ वि०, रसार्णबव; ग्रि०, दौलतपुर जिला राय-

बरेली के, १७४० वि० में उपस्थित; कि०, ग्रियर्सत के १६०, ३३५ और ३५६ संख्यक तीनों सुखदेव एक ही ।

[ soy J सुखदेव कवि ३ स०, अन्तरबेदवाले, १७६१ बि०; ग्रि०, दोआब के, १७५० ई० में उपस्थित, ये ही संभवतः दौलतपुर के सुखदेव मिसर अथवा इसी नाम के कम्पिला के दूसरे कवि भी है । कि०, ग्रि०. के १६०, ३३५, ३५६ संखझ्यक सुखदेव एक ही हैं ।

[८5०६ ]

द्ास्भु कवि - स०, राजा शम्भुनाथसिंह सुलंकी, सितारागढ़वाले १, १७३८ वि०, नायिकाभेंद; ग्रि०, सितारा के राजा शंभुनाथर्सिह सुलंकी, उर्फ शभुकवि, उर्फ ताथकवि, उर्फ TTY, १६५० ई० के आसपास उपस्थित, सुंदरीतिलक, सत्कविगिराविलास, कवियों के आश्रयदाता ही नहीं, स्वयं एक प्रसिद्ध ग्रंथ के रचयिता, यह शंगार-रस में है और इसका नाम काव्य निराली' (?), कि०, शंभुनाथ सोलंकी क्षत्रिय नहीं, मराठे, सरोज भें इस कवि के सम्बन्ध में लिखा है-- “शुंगार को इतको काव्य निराली है । नायिकाभेद का इतका ग्रंथ सर्वोपरि है ।! इसी का भुष्ट भँगरेजी अनुवाद प्रियर्सन ने किया है और इनके काव्य-ग्रंथ का नाम काव्य निराली, ढूंढ़ निकाला है । इनका नखशिख रत्नाकर जी द्वारा सम्पादित होकर भारतजीवन प्रेस, काशी से प्रकाशित

हो चुका है ।”