अध्याय १३ “३२९
अस्त, स्वयंबोध उर्दू, अँगरजी अक्षरों के सीखन॑ का उपाय, बच्चों का इनाम, राजा भोज का ara, aha का वृत्तान्त; उर्--सर्फ-ब-नह्व-ए उर्दू, जाम-ए-जहाननुमा, मज़ामीन, कुछ बयान अपती जुबान का, दिलबहलाव ( तीन भागों में ), किस्सए सेडफडं-:-रूर्टन, दुश्ललन, गुलाब और चमेली का किस्सा, सच्चों बहादुरी, भिक्राबुल काहिलीन, शहादते कुरानी बर कुतुबे ख्वानी, तारीखे कलो-सा, फ़ारसी सफ़ं-व-त छू, छोटा जाम-ए-जहाननुमा । [5१५] शिवनाथ कवि
स०, बुंदेलखण्डी, १७६० वि० रसरञ्जन; ग्रि०., १६६० ई० में उपस्थित, परना (पन्ना) के राजा छत्रसाल (संख्या १६७) के पुत्र राजा जगतर्सिह बुन्देला के दरबार में थे, रसरंजन नाम का एक काव्यग्रंथ लिखा था, टाड के अनुसार छत्रसाल बुन्देला के जगत नाम का कोई पुत्र नहीं था ।
[८१६ ] शिवरास कवि ग्रि०, सिवरामकवि, जृन्म १७३१ ई०; सूदन झ्यंगारी कवि; कि०, १७३१ ई० (Ho १७८८ वि०) कवि का प्रारंभिक रचनाकाल । [awe] farzara कवि स०, १७८८ जि०; ग्रि०, सिवदास कवि गार्सा द तामी ने (भाग १, पु० Vor) इस नाम के एक कवि का उल्लेख किया है, जो जयपुर का निवार्सी था, जिसका एक ग्रंथ शिव चौपाई है । वार्ड ते अपने 'हिस्द्री ऑफ द हिंदूज' (भाग २, पु० ४८१) में इससे एक उद्धरण दिया है । ये एक और भी ग्रथ के रचयिता, जिसका नाम गार्सा द ता तासी ने पोथी लोक उक्ति रस जुक्ति” दिया है; कि०, 'लोक उक्ति रस जुक्ति' का दूसरा नाम लोकोक्ति रस- कौमुदी' है, यह लोकोकितयों में नायिका-मेद है; रचना सं० १८०६ वि० में । [८१८] शिवदत्त कवि ग्रि०, ब्राह्मण, बनारसी, जन्म १८५४ ई०, सभवतः वे ही, जिनका उल्लेख शिवशरसिह' ने विना विवरण दिए 'शिवदत्त कवि' नाम से किया है; कि०, इन्होंने सं० १६२६ ब्रि० में उत्पला- रण्य-पाहात्म्य और १६२३ बि० में ज्ञानग्राप्ति-वारहमासी की रचना की ।
[5६१६] शिवलार दुबे स०, डॉ ड़ियाखेरेवाले, १८३६ वि०; ग्रि०, सिवलाल दूबे डॉड़ियाखेरा, जिला उन्नाव क, जन्म १७८२ ई०, अनेक ग्रंथों के रचयिता, जिनमें नखशिख और पषट्ऋतु ( रागकल्पदुम ) उल्लेख्य । [८२० ] शिवराज कवि ग्रि०ण, सिवराज जयपुर के । [४२१] द्ञिवदीन कबि