अध्याय १३ ३३३ सहारा लल्लूजी लाल ने लिया है, संभवतः इन्हों सुन्दरदास का किया हुआ है। ननसमुंद्र' दादू के शिष्य संत सुदरदास को रचना हैँ। तासी द्वारा उल्लिखित सुंदरविद्या' के सम्बन्ध में कुछ कहना संभव नहीं ।”
[८४४६ ] सुन्दर कवि २ स०, दादूजी के शिष्य, मंवाड़ देश के निवासी; ग्रि०ण, १६२० ई० के आसपास उपस्थित, a aq के शिष्य थे और सुन्दर सांख्य' नामक शांतरस का ग्रंथ लिखा; कि०, “इनका सम्बन्ध जयपुर से है, न कि मेवाड़ से, जयपुर-राज्य के अन्तर्गत धौसा नगरी में इनका जन्म सं० १६५३ वि० और मृत्यु सं० १७४६ वि० में, सुंदर सांख्य/ नाम का इनका कोई ग्रंथ नहीं ।” [ ८४७ ] सखीसूख स०, ब्राह्मण, नखरिवाले कविंद के पिता, १८०७ वि०। [s¥5] सुखरास कवि स०, १६०१ वि०; ग्रि०, चौहत्तरी जिला उन्नाव के ब्राह्मण, १८८३ ई० में जीवित, संभवत' वे ही 'सुखराम कवि', जिन्हें शिवर्सिह ने श्रंगारी कवि कहा है और जिन्हें १८४४ ई० में उत्पन्न (? उपस्थित) माना है; कि०, चौहतरो नहीं, चह्ोत्तर । [८४६ ] सुखदीन कवि fro, HT १८४४ ई०, श्रृंगारी कवि । [८६५० ] सुखन कवि Ho, १६०१ वि०; ग्रि०, जन्म १८४४ ई०, श्यृंगारी कवि । [४५१] aa कवि स०, १६८० वि०; ग्रि०, जन्म १६२३ ई०, हजारा, सूदन । [४५२] सेवक कवि सं०, १८९७ वि०; ग्रि०, १८४० ई० में उपस्थित । [5६५३] सेवक कवि ao, बन्दीजन, बनारसी; प्रि०, १८८३ ई० म जीवित । कि०, “सेवक १८८३ ई० (सं० १६४० वि०) में जीवित नहीं थे, इनकी मृत्यु दो साल पहले सं० १९३५८ में ही हो गई थी, दोनों सेवक एक ही है ।” [ 5शड ] शीतल त्रिपाठी स०, टिकमापुरवाले, लालकवि के पिता, १८६१ वि०; ग्रि०, १८४० ई० में उपस्थित ।