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पृष्ठ:साहित्य का इतिहास-दर्शन.djvu/२५१

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२४० साहित्य का इतिहास- दर्शन स०, राजकुमार, राजा चन्दापुर, [ ६०५ ] सुदर्शन सह १९३० वि०; ग्रि०, चंदापुर के राजा जन्म ( ? उप- स्थिति ) १८७३ ई० कि० " १८७३ ई० (म० १९३० वि० ) निश्चय ही कवि का उपस्थिति काल है; क्योंकि इसके ४ ही वर्ष बाद सरोज की रचना हुई । " [ ६०६ ] शंखकवि ग्रि०, १९२५ ई० के पहले उपस्थित | [६०७] साहब कवि ग्रि०, १६२५ ई० के पहलं उपस्थित । [8०८] सुबुद्धि कवि ग्रि०, १६२५ ई० के पहले उपस्थित | [o] सुन्दर कवि स०, वन्दोजन, असनोवाले, रसप्रबोध, प्रि०, असनी, जिला फतेहपुर के भाट और कवि, रसप्रबोध नामक ग्रन्थ के रचयिता । [ ६१० ] सोमनाथ स०, ब्राह्मणनाथ, भोग साँड़ीवाले, १८०३ वि० । [ε११] सुखराम सo, ब्राह्मण, चौहत्तर, जिला उन्नाव के प्रि०, १८५३ ई० में जीवित संभवतः वेही सुखराम कवि, जिन्हें शिवसिह ने १८४४ ई० में उत्पन्न (? उपस्थित) माना है; कि०, चौहत्तरी नही चहोत्तर, सरोज के दोनों सुखराम एक हो सकते हैं । [ ६१२] समनेश कवि स०, कायस्थ, रीवाँ, बघेलखण्डवासी, १८८१ वि०, काव्यभूषण; ग्रि०, वाँधो के कायस्थ, १८१० ई० में उपस्थित । यं रीवां - नरेश महाराज विश्वनाथसिंह के पिता महाराज जयसिह ( सिंहासनारोहण - काल १८०६ ई०, सिंहासन परित्याग - काल १८१३ ई० ) के दरबारी कवि थे, काव्यभूषण नामक ग्रंथ के रचयिता; कि, "बस्शी समनसिंह उपनाम समनेश ने स० १८४७ में रसिकविलास और सं० १८७९ में पिंगलकाव्यविभूषण की रचना की थी । महाराज जयसिंह ने सं० १८९२ (१८३५ ई० ) वि० म सिंहासन - त्याग किया था, न कि १८७० वि० म ।" [ ६१३] शत्रुजीतसिंह स०, बुंदेला, दतिया के राजा, रसराज-टोका; ग्रि० बुदेलखंड के अंतर्गत दतिया के बुन्देला राजा, रसराज की टीका के रूप में एक अलंकार-ग्रन्थ के रचयिता; कि०, रसराज की टीका