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पृष्ठ:साहित्य का इतिहास-दर्शन.djvu/२८९

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२७८ साहित्य का इतिहास दर्शन निर्गुण और सगुण दोनों ही शाखाओं के संत साहित्यिकों की रचनाओं में दर्शन के अतिरिक्त जो साहित्यिकता है, वह इसी यथार्थता के तत्त्व के कारण। रीतिकाल के संबंध में, इम दृष्टिस, यहाँ अधिक विस्तार से विचार करना तो अनावश्यक ही है। आधुनिक काल में भारतेंदु - युग तथा द्विवेदी युग की तथा समकालीन रचनाओं की यह प्रमुखतम धारा है । छायावाद - रहस्यवाद -युग निस्संदेह इस परंपरा के प्रति उग्र विरोध था, लेकिन यह विशेष रूप से स्मरणीय है कि उसके दो सूत्रधारों ने, अर्थात् 'निराला' और पंत ने आगे चलकर अपने व्यक्तिगत प्रतिभा को उक्त परंपरा के साथ संबद्ध किया । इनमें भी 'निराला' तो छायावाद रहस्यवाद में भी इस परंपरा से अंगतः ही उदासीन थे । इस तरह हम देखते हैं कि भिन्न-भिन्न युगों में आदर्श का ऊपरी आवरण तो बदलता रहा है, किंतु यथार्थता का भीतरी ढाँचा बना रहा है । हिंदी साहित्य की तीसरी महान् परंपरा मानववाद ( IHumanism ) है और चौथी मानवतावाद ( Humanitarianism ) | मानवतावाद किसी प्रकार के अनिवाद ( Extrernism ) को प्रश्रय नहीं देता । मानवतावाद के अनुसार मनुष्य अपने अतीत के ज्ञान और संस्कार की सहायता से अपने वर्त्तमान को मर्यादित कर सकता है। मनुष्य अपनी विवेक शक्ति के आधार पर अपने अतीत और वर्तमान का सदुपयोग कर सकता है। संक्षेप में मनुष्य मनुष्य है; मनुष्य- जीवन की अपनी सार्थकता होती है । साहित्य के क्षेत्र में मानवतावाद के फलस्वरूप जहाँ एक ओर दृष्टिकोण में उदारता आ पाती है, वहीं प्राचीनता और शास्त्रीयता के प्रति थोड़ी-बहुत पक्षपात की प्रवृत्ति भी । कहना न होगा कि प्राचीन भारतीय साहित्य अनिवाद से सर्वथा मुक्त रहा है । दर्शन के क्षेत्र में जो थोड़ी बहुत कटुना थी भी, वह साहित्य में अधिक-से-अधिक ती उपालंभ बनकर रह गई । कबीर यदि केवल दार्शनिक या संत ही रहने, तो उनकी कटुता कितनी चोट पहुंचानेवाली होती। किंतु अभिव्यंजना-विधि में उनकी कटता बहुत-कुछ गृदु हो जाती है और उनकी मानवता ही सतह पर आ पाती है। हिंदू-मुसलमान एक है, परमात्मा ही तो 'राम' है! सगुण भक्ति का कबीर के द्वारा खंडन कुछ तीखा अवश्य है, किंतु तुलमी और सुर जब निर्गुण का खंडन करते हैं, तब उनकी सहिष्णुता देखने ही लायक होती है । मानवता की यह परंपरा हिंदू जीवन और भारतीय साहित्य की विशेषतः हिंदी साहित्य की एक प्रत्यभिज्ञेय परंपरा रही है । , आधुनिक युग में महात्मा गांधी ने इस परंपरा की बड़ी मौलिकता और व्यावहारिकता के साथ प्रतिनिधित्व किया। हिंदी साहित्य को भी उनमे बहुत कुछ मिला । बहुत कुछ क्या, आधुनिक युग के गद्य और पद्य के दो सर्वाधिक प्रसिद्ध लोकप्रिय और श्रेष्ठ लेखक, प्रेमचंद और मैथिलीशरणगुप्त, उन्हीं के द्वारा परिवर्तित और परिवर्तित मानवतावाद से अपनी कला को इतना उत्कर्ष प्रदान कर सके । इन लेखकों की कृतियों में मानवता की पूर्वोक्त दूसरी विशेषताएँ स्पष्ट ही हैं । इधर यह देखकर विचारक चौकन्ने हो रहे थे कि राष्ट्रीय और सामाजिक जीवन के साथ ही साथ साहित्य से भी मानवतावाद धीरे-धीरे अपदस्थ होता जा रहा था और अतिवाद