अध्याय १६ साहित्यिक इतिहास के शेष पक्ष (क) साहित्यिक इतिहास और जन-रुचि ' साहित्य के इतिहास में ओर सामान्यतः कलाओं के इतिहास में भी, कलाकार तथा कला- कृति पर ही विचार केंद्रित रखा जाता है। जन रुचि के विकास की समस्या की उपेक्षा ही होती चली आई है । इसीका परिणाम है कि अतीत या वर्तमान के अनेक कला विषयक परिवर्तन असमावेय प्रतीत होते हैं । ऐसे परिवर्तनों के कारणभूत रुचि-गरिवर्तनों पर विचार करने पर हम बहुधा पाते हैं कि रहस्य सहज ही समझ में आ जाता है। इसके लिए आवश्यक केवल यह है कि साहित्यिक परिवर्तनों को उनके ऐतिहासिक तथा समाजशास्त्रीय परिवेश में रख कर समझने की कोशिश करें । इस दिशा में अपवादस्वरूप जो प्रयत्न हुए हैं, वे अतिगरलीकरण के दोष से ग्रस्त है । उदाहरण के लिए १८६० में Feodinard Brunetiërs का Evolution des genres dans 1' Histoire de la Litterature प्रकाशित हुआ था, जिसमें फ्रांस के इस प्रकांड आलोचक और इतिहासकार ने ललित कलाओं और साहित्य के विकास पर Charles Warwin के 'जीवों के उद्भव के आधारभूत सिद्धांतों को पूर्णतः घटित कर दिखाया था । उसने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया था कि ललित कलाओं ओर साहित्य में भी पहले सरल रूप देखने को मिलते हैं; वे हो वाद में जटिल - जटिलतर बनते चले जाते है, और शाखा प्रशाखाओं में विकसित होते हैं । नाटक के इतिहास में तो उसने योवन, परिपूर्णता, परिपक्वता, क्लांनि, ह्रास तथा विशीर्णता के क्रम निर्दिष्ट करने का भी प्रयाग किया था। इस प्रकार इस फ्रांसीसी विद्वान् ने कला को सजीव जाति मात्रों में विभवन कर उन पर डारविन के 'चयन के सिद्धांत' आरोपित करने का विचक्षणतापूर्ण, किंतु दूरानीन प्रयत्न किया था । ' वास्तविकता यह है कि जीवन और कलाओं के बीच बाह्य और आंशिक गादृश्य भर है। जीवन अपने को प्रजनन अथवा बीजारोपण द्वारा स्वनत्र रूप से प्रसारित करता है, जब कि कला - सृजन मानवीय विचार-व्यापार पर अवलंबित है । प्रकृति में अस्तित्व के लिए जो संघर्ष देखा जाता है, उसे कला में भी दिखाया जा सकता है; किंतु हमें यह स्मरण रखना होगा कि कला के क्षेत्र में विभिन्न रूप या कृतियाँ नहीं, बल्कि प्रवृत्तियाँ संघर्ष करती हैं । ब्रुनेतिएर सिद्ध करना चाहता है कि कभी-कभी साहित्य का रूप विशेष, उदाहरणार्थं नाटक, युग-विशेष में आंतरिक शक्ति से रहित होने के कारण, नष्ट हो जाता है, किंतु तथ्य यह है कि इसके लिए रूप-विशेष नहीं, प्रत्युत कृतिकार उत्तरदायी होते है । मनुष्य के जीवन में न केवल कलाओं का,
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