अध्याय १६ २८५ तक पहुँच सके, तो साहित्यिक इतिहामों के विवरणों में थोड़े-बहुत परिवर्तन आवश्यक हो जा सकते हैं, किंतु अधिकांश में, इस प्रकार के शोध और साहित्यिक इतिहास के क्षेत्र और कार्य भिन्न हैं और उन्हें अपनी सीमाओं का ध्यान रखना उचित है । इस समस्या का गवेषणात्मक से भिन्न साहित्यिक समाधान यह है कि प्राचीन काव्यों के संप्रति निश्चित रूप और उनके संबंध में बद्धमूल परंपरा उनकी प्रामाणिकता के लिए पर्याप्त हैं । यदि कर्नल टॉड ने पृथ्वीराजरासो के आधार पर राजस्थान का इतिहास पुनर्निर्मित करने का प्रयास किया था, तो विशुद्ध इतिहास-विज्ञान की दृष्टि से उन्होंने अपने निष्कर्षो के लिए गलत आधार चुना था, किंतु यदि बुलर के निश्चय की अवहेलना कर नागरी प्रचारिणी सभा ने यह निश्चय किया था कि रॉयल एशियाटिक सोसायटी के द्वारा स्थगित रासो के प्रकाशन - कार्य को वह पूरा करेगी, तो एक साहित्यिक संस्था होने के नाते, उसने स्तुत्य निर्णय करने का साहस दिखाया था, और इसी प्रकार, शुक्लजी ने पृथ्वीराजरासो या वैसी अन्य छोटी- बड़ी रचनाओं के आधार पर वीरगाथा- काल की उद्भावना की थी, उसका विवरण दिया था, साहित्यिक विवेचन प्रस्तुत किया था, तो उन्होंने भी साहित्यिक इतिहासकार के सर्वथा अनुरूप दृष्टिकोण स्वीकार किया था। बुलर ने पृथ्वीराजरासो का प्रकाशन तो स्थगित करा दिया था; क्या वे एलियड और ओडेस्सी के बारे में भी, यदि उन्हें ऐसा अधिकार होता भी, यह रुख अख्तियार करते, और यदि करते, तो उन्हें अन्य साहित्यिकों का समर्थन भी प्राप्त होता ? इस समस्या को ध्यान में रखकर सिद्धांततः महाकाव्यों के दो वर्ग माने जाते हैं । एक तो परंपरागत (Traditional) महाकाव्यों का वर्ग होता है, और दूसरा साहित्यिक महाकाव्यों का । पहले वर्ग के महाकाव्यों को विकास के महाकाव्य ( Epics of Growth ) भी कहते हैं, जिससे उनके वास्तविक रूप का स्पष्टीकरण हो जाता है । रघुवंश या रामचरित मानस या पैरेडाइज लास्ट साहित्यिक महाकाव्य हैं; वाल्मीकि रामायण और महाभारत और एलियड और ओडेस्सी और पृथ्वीराजरासो विकास के महाकाव्य हैं । विकास के ये महाकाव्य एक व्यक्ति या किसी निश्चित अवधि के अंदर नहीं लिखे गये थे । यदि किसी व्यक्ति एक व्यक्ति का नाम किसी ऐसी रचना के साथ जुड़ा हुआ है, तो इसलिए कि उसकी कल्पना उसने की थी, कुछ इसलिए नहीं कि उसने अपनी कृति को शुरू कर खत्म भी कर लिया होगा । यह संभव भी नहीं हैं; क्योंकि रचनाएँ बहुत कुछ पुराणों की प्रकृति की होती हैं, जिनका रचना-काल एक नहीं, अनेक युगों में विस्तीर्ण रहता है; क्योंकि उनमें एक प्रतिपालक का चरितांकन तो मुख्य रूप से होता है, पर उसके वंशधरों का भी गौण रूप से, मूल कवि के वंशजों के द्वारा होता चला जाता है । कभी-कभी कुछ विद्वान्, भाषा- शैली के आत्मनिर्धारित निकषों के सहारे, ऐसे काव्यों के मूल अंश को छाँट निकालने का प्रयत्न करते हैं, पर यह तो बहुत बड़ी बात है, स्पष्टतः प्रक्षिप्त अंशों के अतिरिक्त दूसरे छोटे अंशों को भी अस्वीकृत करना अवांछनीय माना गया है। पूना से महाभारत का जो संस्करण प्रकाशित हो रहा है, उसके संपादकों को प्राच्यविद्या- विशारद विंटरनिस्स ने यही सलाह दी थी और उन्हें सावधान किया था कि वैज्ञानिक संपादन के नाम पर कहीं वे अर्थ का अनर्थं न कर डालें ।
- विकास के महाकाव्यों की रचना होती नहीं, होती चलती है; उसकी रचनात्रषि भी
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