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पृष्ठ:साहित्य का इतिहास-दर्शन.djvu/२९७

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२८६ साहित्य का इतिहास-दर्शन निश्चित नहीं होती, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है । अनेक रचयिताओं और विस्तीर्ण अवधि के फलस्वरूप धीरे-धीरे ऐतिहासिक तथ्य धूमिल पड़ने जाते है और उनकी बहुत अधिक उप- योगिता नहीं रह जाती । फिर भी, नाम और तिथि की दृष्टि से अनुपयोगी होने पर भी, न केवल साहित्यिक इतिहास के लिए, प्रत्युत सांस्कृतिक इतिहास के लिए भी, ऐमे काव्य महत्त्वपूर्ण सिद्ध होते है, और अगर पार्जिटर जैसा परिश्रमी विद्वान् हो, तो जैसे उसने पुराणों से भारतीय इतिहास की आधारभूत सामग्री संकलित कर ली थी, उसी तरह वह इन काव्यों से भी राजनीतिक इतिहास के लिए पर्याप्त तथ्य इट्ठे कर ले सकता है । जहाँ तक साहित्यिक मूल्यांकन, प्रवृत्ति निम्म्मण तथा परंपरा निर्धारण का प्रश्न है, जो साहित्यिक इतिहासकार के लक्ष्य होते है, ये काव्य उतने ही महत्वपूर्ण होते है, जितन साहित्यिक महाकाव्य | वीरगाथा -काल की वीर या प्रेम गाथाओं का उसी दृष्टिकोण से अध्ययन होना चाहिए । जिन्होंने ऐसा किया है, उन्होंने साहित्यिक इतिहासकार के दायित्व का पालन किया है । (ग) लोकवार्त्ता हिंदी में हम ढीले-ढाले ढंग से लोक-साहित्य शब्द का व्यवहार करते हैं । अँगरेजी में लोकवार्त्ता (Folk Lore) शब्द का व्यवहार होता है, हालांकि उसमें थोड़े भ्रम की भी गुंजाइश रहती है । उदाहरण के लिए, फांसीमी और स्कैन्डेनेत्रीय भाषाओं में लोकवार्त्ता के अन्तर्गत परम्परागत गृह-रूप, कृषिसंबंधी रूड़ियाँ, कपड़ा बिनने के तरीके — ये सभी तथा अन्य नृशास्त्रीय विषय भी आते हैं । इसके विपरीत अँगरेजी में यह शब्द, साधारणतः, सामान्य जनता की मौखिक या लिखित परम्पराओं को ही व्यक्त करता है—यह दूसरी बात है कि इस परिभाषा की परिधि भी विषय और शैली की दृष्टि से, अनेक बिन्दुओं पर नृशास्त्र की सीमाओं के सम्पर्क में आ ही जाती है । लोकवार्त्ता के अन्तर्गत सभी प्रकार के लोकगीत, लोककथाएँ, अंधविश्वास, स्थानिक जनश्रुतियाँ, कहावतें, बुझीबल आ जाते हैं। लोकवार्त्ता की तात्त्विक विशेषता यह है कि वह परम्परागत होती है । वह जन समुदाय, जिसमे लोकवार्त्ता संपृक्त रहती है, मौलिकता के महत्त्व को अस्वीकार कर देती है । उसके लिए तो वही प्रामाणिक है, जो पुराना है। मौसम के बारे में कहावतों में भविष्यवाणी रहती है, बीमारियों के नुस्वं बड़े-बूढ़े बना जाते है ! यह समुदाय नवीन जीवन-प्रणालियों से दूर ही रहता है । अट्ठारहवीं शताब्दी के अंत से लोकवार्त्ता के विषय में विद्वानों की अभिरुचि बढ़ी और उसके अध्ययन को पर्सी की पुस्तक Reliques of Ancient English Poetry से विशेष प्रेरणा मिली, जो १७६५ में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद तो समूचे योरोप में और तदनन्तर अमेरिका में लोकगीतों के संग्रह का कार्य शुरू हो गया । इसके नाथ ही साथ लोकगीतों के उद्भव और महत्त्व के संबंध में सैद्धांतिक विवेचन का आरंभ हुआ । लोक गीतों के आकर्षण के दो कारण हैं । पहले तो यह कि उसमे मनोविनोद होता है और उसका संबंध उत्सवों के साथ रहता है । दूसरे रूमाती रुझान के विद्वानों की दृष्टि में लोकं गीत विशुद्ध रूप से मिट्टी की उपज हैं, और इसलिए सर्वसाधारण को भी और सुसंस्कृत