ढंग का ही। अभी भारतीय साहित्यों की अपनी प्रामाणिक और विस्तृत तिथिक्रम-तालिकाएँ तक नहीं हैं,[१] फिर भारतीय साहित्यों के वैसे अंतस्संपृक्त इतिहास के निर्माण का प्रयास ही कैसे संभव है, जैसे इतिहास की संभाव्यता और वांछनीयता का निर्देश प्रस्तुत पुस्तक में यथास्थान किया गया है।
ऐतिहासिक बोध, राष्ट्रीय अथवा भाषागत विशेषताओं का विचार, फिर पार्थक्य में अन्तर्निहित संपृक्तता का अभिज्ञान, तथा युग की प्रवृत्तियों और विकास की चेतना जब प्रत्नतत्त्वानुसंधान-वृत्ति से समन्वित होते हैं, और शताब्दियों से एकत्र होती हुई सामग्री का वे अपने युग की इदानन्तता की दृष्टि से उपयोग करते हैं, तब साहित्येतिहास का निर्माण होता है। पहले सर्वत्र ही सभी साहित्यिक इतिहास जीवनीमूलक तथा इतिवृत्तात्मक सूचनाएँ तथा परिष्कार-सापेक्ष सामग्री के आगार ही रहे हैं। आचार्य शुक्ल ने 'मिश्रबंधुविनोद' की सर्वथा युक्ति-रहित आलोचना की हैं — इटली के Muratori तथा Tiroboschi जैसे विद्वानों के विशाल ग्रंथ, और Histoire litteraire dela France जैसी पुस्तक इति-वृत्त-संग्रह के अतिरिक्त और कुछ थोड़े ही थे। क्रमशः साहित्य के ऐसे विवरणात्मक इतिहास का आविर्भाव हुआ; जिसके पीछे आलोचनात्मक योजना और अतीत के पुनर्मुल्यांकन की चेष्टा थी, यद्यपि प्रारंभ में इनमें भी वैसे पाद्धतिक असामंजस्य थे जैसे, सुपरिचित उदाहरण लें तो, स्वयं शुक्लजी के इतिहास में पाये जाते हैं। Gian Mario Creesimbeni की Istoria della valgar poesia (१६६८) और Thomes Warton की History of English Poetry (१७७४–'८१) ऐसे ही प्राचीनतम साहित्येतिहास हैं। पश्चिम में भी उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ही जाकर वास्तविक साहित्येतिहास के लेखन का आरम्भ होता है, जिसका श्रेय है Bouterwek, Schlegel, Villemain, Sismondi, Emiliani Guidici आदि विद्वानों को। फिर भी यह उल्लेखनीय है कि इसके लिए तैयारियाँ १७वीं-१८वीं शताब्दियों में हुई थीं, जब साहित्येतिहास के लिए सामग्री-संकलन होने लगा था, एवं विकास के सिद्धान्त तथा आलोचना के नवीन विभावनों के आधार स्थापित हुए थे।
साहित्यिक इतिहास के उद्भव और विकास से संबद्ध समस्याओं तथा समाधानों के जो विवेचन प्रस्तुत पुस्तक में निबद्ध हैं, वे बहुलांश में Sigmund Von Lempicki की "Geschichte der deutschen Literateur Wissenschaft biszum Ende des 18. Jahrhunderts", Göttingen १९२० Renè, Wellek "The Rise of English Litearary History", Chapel Hill, N. C. १६४१ तथा Giovanni Gelto की "Storia delle Storie letterarie", Miton, १६४२; पर अवलंबित हैं। इनमें भी मैं Rene Wellek की पुस्तक का विशेष रूप से ऋणी हूँ। औरों का आभार-उल्लेख पादटिप्पणियों में है।
पुस्तक जिन्हें समर्पित है उन्हें, वह जैसी है, समर्पित है: मेरी कविता के सम्बन्ध में प्रतिकूल विचार रखने पर भी, वे मेरी कहानी, आलोचना, गवेषणा आदि को उपेक्षणीय नहीं मानतीं, यह उनकी गुणज्ञता ही है।
यह पुस्तक परिषद् के आद्य संचालक आचार्य शिवपूजन सहायजी तथा जननांतरसुहृद श्री उमानाथजी की कृपा और प्रेरणा का परिणाम है। उन्हें इसे प्रकाशित देख उतनी प्रसन्नता होगी, जितनी मुझे भी नहीं हो सकती।
- ↑ 'साहित्य' के अंकों में हम ऐसी तालिकाएँ क्रमशः तैयार कराके प्रकाशित कर रहे हैं।—ले॰