रूसी अध्याय १२. पाश्चात्य साहित्यिक इतिहास : पोलिश और चेंक सी रूपवाद ने प्रतिवेशी देशों के वैदुष्य को भी पर्याप्त मात्रा में प्रभावित किया । पोलैंड के रोमन इंगार्डेन ' ने काव्य-कला का सूक्ष्म विश्लेषण किया है। उसके अनुसार कोई भी काव्य-कृति स्तरों की पद्धति है - वह ध्वनि-प्रतिरूप से उन दार्शनिक गुणों की ओर उठती है, जो अंततः उसकी समग्रता से आविर्भूत होते हैं । इंगोर्डेन की अभिरुचि 'साहित्येतिहास से अधिक दर्शन में है; किंतु उसके विपरीत जो प्रचलित प्राविधिक साहित्येतिहास था, वह आदर्शा- त्मक और राष्ट्रीयतावादी था । इनसे भिन्न मैनफेड क्रिडल ने रूसी पद्धतियों को अपनाते हुए अनेक रूपवादी अध्ययन प्रस्तुत और प्रेरित किये । उसने साहित्येतर पद्धतियों से विहित साहित्यानुशीलन का तीव्र विरोध किया है । उसकी 'सांग साहित्यिक' ('integrally literary' ) पद्धति साहित्य के सामाजिक संदर्भ को गौण मानती है और सामान्य साहित्ये - तिहास में पाये जानेवाले पद्धति-विषयक मिश्रण की कटु आलोचना करती है । २ चेकोस्लोवाकिया को तो सर्वाधिक मौलिक रूसी रूपवादी, रोमन जैकोबसन, की सेवाएँ प्राप्त हुई थीं । जैकोबसन ने चेक विद्वानों के एक ऐसे वर्ग का नेतृत्व प्राप्त किया, जिसने उसके आगमन के पूर्व ही साहित्यानुशीलन की ऐतिहासिक, आदर्शात्मक अथवा मनोवैज्ञानिक पद्धतियों का विरोध आरंभ कर दिया था । वाइलेम मैथेसियस ( Vilém Mathasius) की अध्यक्षता में १६२६ में, संगठित प्राहा भाषिकी केंद्र (Prague Linguistic Circle) के सदस्यों ने रूसी रूपवादियों की अध्ययन-पद्धतियों को नई सामग्रियों के अनुशीलन के लिए तो व्यवहृत किया ही, इसके अतिरिक्त उन्हें अधिक दार्शनिकोचित रीति से विकसित करने का भी प्रयास किया। उन्होंने 'रूपवाद' शब्द के स्थान पर 'संस्थानवाद' ('Structuralism' ) को अपनाया, और विशुद्ध रूपवादी पद्धति के साथ समाजशास्त्रीय एवं आदर्शवादी पद्धतियों का समन्वय किया । ३ जान मुकारोवस्की इनमें सर्वाधिक उल्लेख्य है। उसने अनेक काव्य-कृतियों के मौलिक अध्ययन, और चेक छांदिकी तथा वाक्सरणि का इतिहास तो प्रस्तुत किये ही हैं, साथ ही साथ उसने प्रतीकात्मक रूपों के समग्र दर्शन के साथ रूपवादी सिद्धांत को समन्वित करने का प्रयास किया है, तथा उसे एक ऐसे सामाजिक दृष्टिकोण से संबद्ध करने का विभावन किया है, जो सामाजिक और साहित्यिक विकास को एक द्वंद्वात्मक तनाव के रूप में देख सके । साहित्यिक अनुशीलन की नई दिशा आधुनिक भाषिकी तथा दर्शन के ऐसे सहयोग से ही कदाचित् उद्घाटित हो सकती है । टिप्पणियाँ १। Das dichterische Kunstwerk, Halle, १६३१; O. Poznawaniu dziela literacki ego (साहित्यिक कला-कृति के जानने के बारे में), Lwów, १६३७।
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