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साहित्य का उदेश्य

और तत्वों मे कोई ऐसा पारस्परिक सम्बन्ध नहीं है जो उन्हे सघटित करके एक राष्ट्र का स्वरूप दे सके । यदि आज भारतवर्ष से अगरेजी राज्य उठ जाय तो इन तत्वो मे जो एकता इस समय दिखायी दे रही है, बहुत सम्भव है कि वह विभेद और विरोध का रूप धारण कर ले और भिन्न-भिन्न भाषाओ के आधार पर एक ऐसा नया सघटन उत्पन्न हो जाय जिसका एक दूसरे के साथ कोई सम्बन्ध ही न हो। और फिर वही खींचातानी शुरू हो जाय जो अंगरेजो के यहाँ आने से पहले थी। अतः राष्ट्र के जीवन के लिए यह बात आवश्यक है कि देश मे सास्कृतिक एकता हो। और भाषा की एकता उस सास्कृतिक एकता का प्रधान स्तम्भ है; इसलिये यह बात भी आवश्यक है कि भारत- वर्ष की एक ऐसी राष्ट्रीय भाषा हो जो देश के एक सिरे से दूसरे सिरे तक बोली और समझी जाय । इसी बात का आवश्यक परिणाम यह होगा कि कुछ दिनों मे राष्ट्रीय साहित्य की सृष्टि भी आरम्भ हो जायगी और एक एसा समय पायेगा, जब कि भिन्न-भिन्न जातिगे और राष्ट्रो के साहित्यिक मण्डल मे हिन्दुस्तानी भाषा भी बराबरी की हैसियत से शामिल होने के काबिल हो जायगी।

परन्तु प्रश्न तो यह है कि इस राष्ट्रीय भाषा का स्वरूप क्या हो ? अाजकल भिन्न-भिन्न प्रान्तों मे जो भाषाएँ प्रचलित हैं, उसमे तो राष्ट्रीय भाषा बनने की योग्यता नहीं, क्योकि उनके कार्य अोर प्रचार का क्षेत्र परिमित है । केवल एक ही भाषा ऐसी है जो देश के एक बहुत बडे भाग मे बोलो जाती है और उससे भी कहीं बडे भाग मे समझी जाती है। और उसी को राष्ट्रीय भाषा का पद दिया जा मकता है। परन्तु इस समय उस भाषा के तीन स्वरूप है-उर्दू, हिन्दी और हिन्दुस्तानी । और अभी तक यह बात राष्ट्रीय रूप से निश्चित नही की जा सकी है कि इनमे से कौन-सा स्वरूप ऐसा है जो देश में सबसे अधिक मान्य हो सकता है और जिसका प्रचार भी ज्यादा आसानी से हो सकता है । तीनो ही स्वरूपो के पक्षपाती और समर्थक मौजूद है और उनमे खींचातानी हो रही है।