पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१००

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सिद्धान्त और अध्ययन भावापहरण करना ही वास्तविक चोरी है । चोरी के सम्बन्ध में अन्य अंग्रेजी लेखकों ने भी ऐसे ही भाव प्रकट किये हैं। ड्राइडन : ड्राइडन ने जॉनसन के सम्बन्ध में कहा है कि वह दूसरे लेखकों पर बादशाहों की भाँति आक्रमण करता है, जो वस्तु दूसरों के लिए चोरी कह- लाती है उसके लिए विजय थी। बच्चे की भांति विचार भी उसी का है जो उसको अपनाकर उसका पोषण करता है तथा उस पर लाड़-प्यार करता है। पीतल का अधिक मूल्य नहीं होता है, उस पर की गई कारीगरी का मूल्य है। लेखक या कवि दूसरे के विचारों को सामग्री के रूप में ही ले सकता है। अगर वह उसको कच्चे सीधे की भाँति लेकर पक्वान्न में परिणत करता है तो वह दोषी नहीं कहा जा सकता। जिस प्रकार सृजन के लिए प्रतिभा अपेक्षित है उसी प्रकार प्रास्वादन, भावना या आलोचना के लिए रुचि (Taste) वाच्छनीय है। इसी को हमारे यहाँ भावयित्री प्रतिभा कहा है । अब प्रश्न यह है कि दोनों प्रतिभा और रुचि प्रकार की प्रतिभाएँ एक है अथवा भिन्न ? यदि एक नहीं हैं तो उनमें क्या सम्बन्ध है ? हमारे यहाँ इनको अधिकांश में भिन्न ही माना है । कवि की प्रतिभा को अभिनव- गुप्त ने आख्या और भावक की प्रतिभा को उपाख्या कहा.है। राजशेखर ने पहली को कारयित्री और दूसरी को भावयित्री नाम से अभिहित किया है। अन्यत्र कहा भी गया है :- 'नमकस्मिन्नतिशययता सन्निपातो गुणानाम् । एक: सूते 'कनकमुपलः, तत्परीक्षासमोऽन्यः ॥' -कविरहस्य (पृष्ठ २१ के उन्हरण से उद्धत) अर्थात् अधिक प्रतिभावान् में भी बहुत-से गुण ( अर्थात् काव्य-रचना को शक्ति और काव्य के सुनने तथा उसके आस्वाद लेने की शक्ति) इकट्ठ । नहीं होते । एक पत्थर से तो सोना निकलता है तो दूसरे पत्थर पर सोना कसा जाता है। इन दोनों प्रकार की प्रतिभानों का एक ही व्यक्ति में होना कठिन बतलाया गया है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है।- 'मन-मानिक-मुकता-छवि जैसी । अहि-गिरि-गज सिर सोह न तैसी ।। नृप-किरीट तरुनी-तनु पाई । लहहिं सकल सोभा अधिकाई ॥ तैसेहि सु-कवि-कवित बुध कहहीं। उपजहिं अनत अनत छवि नहीं । . रामचरितमानस ( मालकाण्ड)