पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१०३

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६ : कविता और स्वप्न कल्पना यद्यपि मैं कविता करने के सौभाग्य से वंचित रहा हूँ तथापि मैं क्षम्य गर्व के साथ कह सकता हूँ कि स्वप्नों के सम्बन्ध में मेरी मस्तिष्क-भूमि बड़ी उर्वरा है किन्तु मेरे स्वप्न किसी कवि, सुधारक, आविष्कारक आत्मप्रसङ्ग या राष्ट्रनिर्माता-के-से नहीं होते वरन् वे ऐसे होते हैं जो चिन्ताग्रस्त, भग्नमनोरथ तथा चिन्ताग्रस्त. भग्नमनोरथ तथा भावाक्रान्त लोगों के संतप्त और उद्वेजित मस्तिष्क को रात में भी क्रियाशील बनाये रखते हैं और जिनकी थकावट 'हालिक्स माल्टेड मिल्क' के विज्ञापनों को भी मिथ्या प्रमाणित करने का श्रेय प्राप्त कर सकती है। जहाँ तक मेरे निजी अनुभव का सम्बन्ध है, मैं तो अब ज्ञानियों की भाँति जागरण को एक ईश्वरीय वरदान समझता हूँ किन्तु मैं जानता हूँ कि कुछ लोग ऐसे सुख-स्वप्न अवश्य देखते हैं कि जिनसे जागना एक अभिशाप होता है । और लोग तो सोकर खोते हैं, ऐसे लोग जागकर खोते हैं.---'मीरन और तो सोय के खोवत्त मैं सखि प्रीतम जागि गॅवाये । कविता . यदि स्वप्न है तो ऐसा ही सुख-स्वप्न है। .. स्वप्न और कविता का तादात्म्य तो नहीं हो सकता क्योंकि स्वप्न के मान- सिक प्रत्यक्ष वास्तविक प्रत्यक्ष से कम सजीवता नहीं रखते हैं (उसमें तात्का- लिक सत्य तो अवश्य ही होता है) । हमें कभी-कभी अपने स्वप्नों की सत्यता म सन्देह होने लगता है किन्तु वह शंका भी शीघ्र ही स्वप्न-जाल में विलीन हो जाती है । स्वप्न में वाह्य संसार से हमारा अपेक्षाकृत सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है । कविता में ऐसा अधिक नहीं होता। कविता स्वप्न तो नहीं किन्तु वह उसकी कुटुम्बिनी अवश्य है और दिवा- स्वप्नों के बहुत निकट आजाती है। यदि हम स्वप्न का विश्लेषण करके देखें तो उसकी बहुत-सी सामग्री हमको कविता में मिल जायगी। स्वप्न के तत्व स्वप्न के उदय होने में कुछ वाह्य कारण होते हैं .. और कुछ भीतरी। साधारण प्रत्यक्ष (Perception) में बाहरी सामग्री संवेदना (Sensations) के रूप में आती है किन्तु