पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१०७

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कविता और स्वपन-तुलना अब हम कविता पर पाते हैं। श्रीमती महादेवी वर्मा ने साहित्य-सम्मेलन से प्रकाशित अपनी कविताओं के संग्रह की भूमिका में कहा तुलना है कि---कवि को वास्तविक द्रष्टा के साथ स्वप्न-द्रष्टा भी होना चाहिए' । अब जरा विचार करने पर यह स्पष्ट हो जायगा कि कवि किस अर्थ में स्वप्नद्रष्टा विश्वामित्र की भांति अपना संसार रचता है। उसमें प्रायः वर्तमान के प्रति असन्तोष की भावना रहती है। वह अपनी इच्छा में अनुकूल संसार को बदल लेता है :-- 'अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः । यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते ।' -अग्निपुराण ( ३३६ । १०) स्वप्न में भी परिवर्तन होता है। स्वप्न-सम्बन्धी परिवर्तनों को फायड ने 'Condensation' अर्थात् धनीकरण-जैसे व्यक्तियों का मिला देना अर्थात् एक के व्यक्तित्व या आकार में दूसरे का व्यक्तित्व या आकार मिला देना--और 'displacement' अर्थात् स्थानान्तर करना कहा है। स्वप्न के परिवर्तन प्रायः अस्पष्टता लाते हैं और कुछ विकृति भी उत्पन्न करते हैं किन्तु कविता के परिवर्तन स्पष्टता और सुष्ठता का सम्पादन करते हैं । कवि के स्वप्नों का आधार वास्तविक संसार अवश्य होता है किन्तु साधारण लोगों की अपेक्षा उसमें भावनाओं, स्मृतियों तथा अभिलाषाओं का अधिक मेल रहता है । कवि यदि जगबीती बात भी कहता है तो उसमें अपनी अभिलाषाओं और अपने आदर्शों का रङ्ग दे देता है । स्वप्न की तरह कविता करने में चाक्षुष-प्रत्यक्ष की अपेक्षा मानसिक क्रियाओं का प्राधान्य होता है। कवि की रुद्ध और दबी हुई अभिलाषाएँ तथा वासनाएँ निर्भर के स्रोत की भाँति फूट पड़ती हैं और वह अपने अभिलषित संसार का स्वप्नद्रष्टा की भाँति मानसिक प्रत्यक्ष कर लेता है। उसमें उसकी अहंभावना की तृप्ति हो जाती है। जो बातें वह अपनी प्रेयसी से कहना चाहता है, कविता में उनके शब्द-चित्र उपस्थित कर उनको मुखरित कर देता है। मानस के भरत प्रादि पात्रों में तुलसी की भक्ति- भावना बोलती हुई सुनाई पड़ती है । कविता की पंक्तियाँ कवि के दुःख-सुख की वाहिनी बन जाती हैं । कवि अपने भावों को व्यक्त करके कुछ हलकेपन और शान्ति का भी अनुभव करता है, शायद वह मिलन का सुख भी प्राप्त करने लगता है और किसी-न-किसी अंश में मनमोदकों से उसकी भूख भी बुझ जाती है। फ्रायड के स्वप्न-द्रष्टा की भाँति कवि किन्हीं अंशों में प्रतीकों ( Symbr