पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१०८

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सिद्धान्त और अध्ययन ols ) से भी काम लेता है। कभी कामवासना पर भक्ति का प्रावरण डाल दिया जाता है और कभी-कभी कविगण ज्ञान और भक्ति पर वाराना का शर्करावेष्टन चढ़ाकर उसको अधिक ग्राह्य बना देते हैं, कभी प्राध्यात्मिक आनन्द का भौतिक आनन्द की शब्दावली में चित्रण कर उसको लोकराामान्य के अनुभव की पहुँच में लाया जाता है । कवि के रूपक भी स्वप्न-के-से प्रतीक ही होते हैं। यदि वे किसी भाव के प्रतीक नहीं होते तो वे कवि के हृदय की उत्कण्ठा के तो चिह्न होते ही हैं। कवि जिस उत्कृष्ट रूप में अपने वर्ष | विषय को देखना चाहता है उसी के वह रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलङ्कार बना लेता है । उत्प्रेक्षा का अर्थ ही है उत्कट प्रेक्षण-इच्छा । रूपक का भी अर्थ है रूप का आरोप। रूपकों और उत्प्रेक्षात्रों द्वारा कवि एक हलके प्रकार से अपनी अभिलाषापूत्ति कर लेता है । स्वप्नों में भी प्रायः रूपकों-का-सा आरोप रहता है। हम लोगों को प्रायः बदला हुआ-सा देखते हैं। __कवि की कल्पना कभी-कभी दिवा-स्वप्नों की भांति असङ्गल्पित और अनियन्त्रित रूप से चलती है-'बादल से बंधे पाते हैं मजम मेरे आगे' ..... और कभी उसमें प्रयास से भी नये चित्र लाने पड़ते हैं । कधि को सम्बन्ध-ज्ञान से भी बहुत काम लेना होता है और उराके समतामूलक तथा विरोधमूलक अलङ्कार एक प्रकार के सम्बन्ध-ज्ञान से ही सम्बन्ध रखते हैं । जब कवि की कल्पना अधिक प्रबल हो जाती है और उसका प्रवाह कुछ-कुछ अनियन्त्रित रूप से चलता है तब उसको अंग्रेजी में फंसी (IFtuncy) कहते हैं। ऐसी अवस्था में कवि चाहे दिवा-स्वप्न न देखे किन्तु एक के बाद एक सम्बन्ध की शृङ्खला तैयार होती चली जाती है। जहाँ उपमाओं की झड़ी लग जाती है, जैसी पत्तजी की 'छाया' या 'नक्षत्र' नाम की कविताओं में, वहाँ सम्बन्ध-ज्ञान ही काम करता है और कभी-कभी वह बहुत अनियन्त्रित प्रकार का होता है। स्वप्न में भी सम्बन्ध-ज्ञान बड़े अनियन्त्रित रूप से काम करता है जिसको हम अनियन्त्रण कहते हैं वह शायद लुप्त-सुप्त वासनाओं का नियन्त्रण होता है। अच्छी कविता में भी प्रायः भावनाओं का ही मनोराज्य रहता है, लेकिन उनमें स्वप्न की अपेक्षा बुद्धि का नियन्त्रण कुछ अधिक होता है। कभी-कभी स्वप्न-चित्रावली शब्द-चित्रों का रूप धारण कर कविता बन जाती है। अंग्रेजी साहित्य में कालरिज की Kublakhan' नाम की कविता इसका उदाहरण है। स्वप्न और कविता में एक अन्तर यह भी है कि यद्यपि रस की अवस्था वेद्यान्तरशून्य मानी गई है तथापि कविता में प्रत्यक्ष संसार और उराकी कटोर वास्तविकता कम भुलाई जाती है।