पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१०९

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कविता और स्वप्न-कुछ कवियों के स्वप्न कविता का उदय चाहे अवचेतना में हो किन्तु वह पल्लवित सजग चेतना में ही होती है । स्वप्न में व्यक्ति का अंश प्रधान रहता है और जाति की भाव- नाएँ कुछ अल्प मात्रा में मिलती है। कविता के व्यक्ति में जाति की झलक रहती है । कविता-की-सी सामाजिकता भी स्वप्न में नहीं है। प्रायः सभी कविताएँ किसी-न-किसी प्रकार से कवि का स्वप्न होती है अर्थात् वह वास्तविकता को जिस रूप में देखता है या देखना चाहता है, इस बात की वे परिचायका होती हैं। कविता की अपेक्षा नाटक में स्वप्न-का-सा आत्मभाव का द्वैधाकरण (Splitting of personality) कुछ अधिक रहता है। कवि और विशेषकर नाटककार अपने को विभिन्न पात्रों की स्थिति में रख लेता है। स्वप्न में यह कार्य अचेतन रूप से किन्तु पूर्णता के साथ होता है। स्वप्नों की भाँति कविताओं में भी भविष्य की स्थिति का संकेत रहता है और कभी-कभी उससे क्रियात्मक लाभ भी उठाया जा सकता है । कुछ कविताओं में पूर्वानुभूत सुखों का वर्णन या प्राचीन गौरव कुछ कवियों का चित्र रहता है। ऐसी कविताओं को हम अतीत का के स्वप्न स्वप्न कहेंगे। पन्तजी की 'ग्रन्थि' को हम ऐसे ही स्वप्नों में रक्खेंगे । उत्तररामचरित में भी ऐसे स्वप्न मिलते हैं । श्रीमैथिलीशरणजी गुप्त की "भारत-भारती' में हमारे देश के अतीत के स्वप्न अच्छे हैं। पंतजी की 'भावी पत्नी' नाम की कविता को हम दिवा-स्वप्न कह सकते हैं । इसमें उनकी प्रान्तरिक कल्पना का प्रत्यक्षीकरण हो गया है :- 'नवल मधुऋतु-निकुन्ज में प्रात, प्रथम-कलिका-सी अस्फुट गात, नील नभ-अन्तःपुर में, तन्धि ! दूज की कला सदृश नवजात; मधुरता, मृदुता-सी तुम, प्राण ! न जिसका स्वाद-स्पर्श कुछ ज्ञात; कल्पना हो, जाने, परिमाण ? - प्रिये, प्राणों की प्राण !' -गुरुजन (पृष्ठ ४०) इस प्रकार कवि अपने मन के उल्लास को व्यक्त करता है। एक अभिलाषामूलक ध्वनि और गति का चित्र हिन्दी के होनहार कवि श्रीचिरंजीलाल 'एकाकी' के 'रजनी' नामक एकांकी नाटक से दिया जाता है :-- .