पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/११०

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सिद्धान्त और अध्ययन 'कल्पना-सी सुन्दर, साकार स्वर्ण-नपुर की भर भतार गुलाबी चरणों से चल मौन खोल दे मेरे उर का द्वार' भक्तों ने अपने-अपने विश्वासों के अनुकूल मनोरथों के सुख-स्वप्न देखे हैं। रसखान का प्रसिद्ध सवैया जो नीचे दिया जाता है कवि की अभिलाषा का सुन्दर चित्र है। ऐसी अवस्थाओं में अभिलाषाओं का कथान-गान स्वान-की-सी आंशिक पूत्ति अवश्य कर देता है । देखिए रसखानजी कैसे श्रानन्द-विभोर हो कहते हैं :- 'मानुष हो तो वही 'रसखानि', बसौं अज गोकुल गाँव के ग्वारन । जो पशु हौं तौ कहा बस मेरो, चरौं नित नन्द की धेनु मँझारन ॥ पाहन हौं ती बही गिरि को, जो धरयो कर छन्न पुरंदर धारन । जो खग हौं तौ बसेरो करौं नित, कालिन्दी कूल कदंब की बारन ॥' रसखान और उनका काव्य (पृष्ठ ) यह स्वप्न कवि की भावुकता और कथावाग्निों में सुनी हई बातों के सम्बन्ध-ज्ञान से बना है। गोस्वामी तुलसीदाराजी ने भी एक वार्तव्य-सम्बन्धी स्वप्न देखा है, वह अत्यन्त सुन्दर है :--- 'कबहुँक हौं यह रहनि रहौंगो। श्रीरघुनाथ -कृपालु-कृपा ते सन्त-स्वभाव गहाँगो ॥१॥ पर-हित-निरत निरन्तर मन क्रम बचन नेम निबहौंगो ॥२॥' -विनयपत्रिका (पद १७२) इसमें चाक्षुष चित्र तो कम है किन्तु उनके जीवन का श्रादर्श प्रति- बिम्बि ___ महात्मा भर्तृहरि ने अपने 'वैराग्यशतक' में गङ्गा-तीर पर किसी शिला के ऊपर पद्मासन बाँधकर बैठने का स्वप्न देखा है और अभिलाषा की है कि कब ऐसे बैठे हुए उनके शरीर से हिरण निर्भय होकर अपने सींगों की खुजली मिटायँगे :- 'गङ्गातीरे - हिमगिरिशिलायचपशासनस्य, ब्रह्मध्यानाभ्यसनविधिना योगनिद्रागतस्य । " किं तैर्भाच्य सुदिवसैयरनते निर्विशका, सम्प्राप्यस्यन्ते जरठ हरिणाः शृङ्गकण्डूयिनीयम्' ।। -~भतृहरिशतक (वैराग्यशतक)