पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१११

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कविता और स्वप्न--कुछ कवियों के स्वप्न भक्तों के मनोराज्य बड़े ही सुन्दर होते हैं। महात्मा सूरदास का स्वप्न सुनिए :- 'ऐसेहि बसिये ब्रज की बीथिन । साधुनि के पनबारे चुनि-चुनि उदर जु भरिये सीतनि ।। पैंडे में के असन बौनि तन छाया परम पुनीतनि । कुंज-कुज तर लोटि-लोटि रचि रज लागै रंगी तनि ॥ निसि दिन निरखि जसोदानंदन अरु जमुना जल पीतनि । दरसन 'सूर' होत तन पावन, दरस न मिलत अतीतनि ।' -सूरपञ्चरत्न (विनय, पृष्ठ 8) कवि लोग हमेशा अपने ही स्वप्नों का वर्णन नहीं करते हैं वरन् वे योगी की भाँति दूसरे के शरीर में प्रवेश कर उसके स्वप्न देख कर मग्न होते हैं। वे अक्सर स्वयं छिपे रहकर दूसरे के मुख से अपनी बात कहलाते हैं । पण्डित माखन- लाल चतुर्वेदी की 'फूल की चाह' शीर्षक कविता में कवि की राष्ट्रीय आत्मा के दर्शन मिलते हैं :- 'चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊँ । चाह नहीं, प्रमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ ।। चाह नहीं, सम्राटों के शव पर हे हरि ! डाला जाऊँ । चाह नहीं, देवों के सिर पर चढू, भाग्य पर इठलाऊँ। मुझे तोड़ लेना वनमाली ! उस पथ में देना तुम फेक | मातभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पंथ जायें वीर अनेक ।।' -माखनलाल चतुर्वेदी (पुष्प की अभिलाषा) दूसरे के भावों को अपना बना लेने को कुछ अंग्रेजी मनोवैज्ञानिकों ने 'Empathy' कहा है । 'Sympathy' में सहानुभूति होती है, 'Empathy' में भावतादात्म्य कर कवि स्वयं अपने को नायक की स्थिति में रख लेता है। बहुत-सी जगबीती कवितानों में भी 'Empathy' से ही काम लिया जाता है । इसी से कवि हरएक वर्ग का प्रतिनिधि होकर उसका स्वप्न देखने लगता है, जिस प्रकार स्वप्नद्रष्टा अपनी जाग्रत अवस्था की सृष्टि का अपनी कल्पना में कुछ हेर-फेर के साथ पुननिर्माण करता है उसी प्रकार कवि भी वास्तविकता को अपने भावों का रङ्ग देकर चित्रित करता है। कवि की चित्रावली नितान्त उच्छल नहीं होती, उसमें बुद्धितत्त्व के लिए स्थान रहता है। कोई कवि जीवन में से सुन्दर चित्र लेते हैं और कोई करुण । स्वप्न और कविता दोनों में ही रुचि और भावनाओं के अनुकूल चुनाब रहता है । करुणा भी कोमल भावों को जाग्रत