पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/११३

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७: सत्यं शिवं सुन्दरम् ___ वर्तमान युग में 'सत्यं शिवं सुन्दरम्' कला और साहित्य-जगत का आदर्श वाक्य बना हुआ है । सब लोग इसी की दुहाई देते हैं और इसको वेद-वाक्य ____ नहीं तो उपनिषद्-वाक्य-का-सा महत्त्व प्रदान करते हैं। प्राचीन आदर्श वास्तव में यह साहित्य-संसार का महावाक्य यूनानी दार्शनिक अफलातू द्वारा प्रतिपादित 'The True, The Good, The Beautifulh का शाब्दिक अनुवाद है किन्तु वह इतना सुन्दर है कि हमारी देशी भाषाओं में घुल-मिल गया है । इसमें विदेशीपन की गन्ध तक नहीं पाती। इसका एक-मात्र कारण यह है कि यह भारतीय भावना के अनुकूल है। भारतवर्ष में यह विचार नितान्त नवीन भी नहीं है। वाणी के तप का उपदेश देते हुए योगीराज भगवान् कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय में अर्जुन को बतलाया है कि ऐसे वाक्य का बोलना जो दूसरों के चित्त में उद्वेग न उत्पन्न करे, जो सत्य, प्रिय और हितकर हो तथा वेद-शास्त्रों के अनुकूल हो, वाणी का तप कहलाता है :- 'अनुद्वेगकर वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥' -श्रीमद्भगवद्गीता (१७११५) 'सत्यं प्रिय हितं सत्यं शिवं सुन्दरम् का ठेठ भारतीय रूप है। वाणी का तप होने के कारण साहित्य का भी आदर्श है । 'किरातार्जुनीय' में 'हित' और 'सुन्दरम्' का योग बड़ा दुर्लभ बतलाया है--'हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः- काव्य इसी दुर्लभ को सुलभ बनाता है। सत्य और शिव का समन्वय करते हुए कवीन्द्र रवीन्द्र ने प्राचार्य क्षितिमोहन सेन द्वारा लिखित 'दादू' नाम के बङ्गाली ग्रन्थ की भूमिका में लिखा है 'सत्य की पूजा सौन्दर्य में है, विष्णु की पूजा नारद की वीणा में है' । विष्णु तो सत्य के साथ शिव भी हैं (और महादेव भी केवल रुद्र' और संहारकर्ता नहीं है वरन् शिवशङ्कर भी है) इसलिए तीनों ही कारणों का समन्वय हो जाता है। साहित्य और कला की अधिष्ठात्री देवी