पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१४

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( १० ) ध्वनिकार या आनन्दवर्धन (कुछ लोग इनको दो व्यक्ति मानते हैं और कुछ लोग एक ही ) इसके प्रवर्तक नहीं हैं । इनसे पहले भी ध्वनि के मानने वाले और विरोधी थे । कुछ लोग इसका प्रभाव मानते हैं, कुछ लोग इलको लक्षण (भक्ति) के अन्तर्गत मानते हैं और कुछ लोग इसको अनिर्वचनीय मानते थे- 'केचिद्वाचां स्थितमविषये' (ध्वन्यालोक, ११)। प्रानन्दवर्धन ने इन तीनों मतों ' का खण्डन कर ध्वनि की स्थापना की । ध्वनि शब्द व्याकरण से उधार लिया हुआ है । आनन्दवर्धन भो आत्मा की ओर झुके । उन्होंने काव्य की आत्मा को ध्वनि बताया-'काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति' (ध्वन्यालोक, १११) । पानन्द- वर्धन के विरोधी भी रहे और समर्थक भी । एक विरोध तो वक्रोक्तिजीवित- कार कुन्तल का था जिन्होंने ध्वनि को भी वकोक्ति के ही अन्तर्गत माना है और दूसरे विरोधी थे महिम भट्ट जिन्होंने अपने 'व्यक्ति-विवेक' नामक ग्रन्थ में ध्वनि को अनुमान के अन्तर्गत सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। तीसरे विरोधी हैं 'दशरूपककार' धनञ्जय, वे रसवादी थे । ध्वनिकार के समर्थकों में सब से शक्तिशाली समर्थक हैं ध्वन्यलोक की 'लोचन' ('लोचन' का पूरा नाम है 'काव्यालोक-लोचन' ) नाम की टीका के कर्ता अभिनवगुप्तपादाचार्य ( नवीं शताब्दी के मध्य में ), जिन्होंने भरतमुनि के 'नाटयशास्त्र की 'अभिनवभारती' नाम की टीका लिखी थी। उसमें उन्होंने भरतमुनि के रस-निष्पत्ति-सम्बन्धी सूत्र की व्याख्या में पूर्वाचार्यों की विवेचना कर और अपना अभिव्यक्ति-सम्बन्धी नवीन और मौलिक मत देकर रस-शास्त्र की बहुत-सी गुत्थियाँ सुलझाई । ध्वन्यालोक की टीका में भी रस-निष्पत्ति का प्रसङ्ग भली प्रकार पल्लवित किया गया है । ध्वनिकार ने यद्यपि रस को ध्वनि के अन्तर्गत माना तथापि रसध्वन्नि को प्रधानता दी । इस प्रकार ध्वनि-सम्प्रदाय ने भी दबे हुए रस-सम्प्रदाय को अलङ्कारवाद के भार से मुक्त कर रस-सिद्धान्त के उद्धार में योग दिया । प्राचार्य मम्मट :-ध्वनि-मार्ग के अनुयायियों में सब से लोकप्रिय प्राचार्य मम्मट (११वीं शताब्दी) हैं। उन्होंने भामह के 'शब्दार्थो सहितौ काव्यं' में 'अग्निपुराण' (३३७७) का 'काव्यं स्फुरदलकारं गुणयहोषवर्जितम्' को १. ये तीनों मत नीचे के श्लोक में उल्लिखित हैं :-- 'काव्यस्थात्मा ध्वनिरिति बुधैर्यः समाम्मानपूर्वः । तस्याभावं जगदुरपरे भाक्तमाहुस्तमन्ये ॥ केचिद्वाचा स्थितमविषये तस्वमूचुस्तदीयं । तेन ब्रमः सहृदयमनः प्रीतये तस्स्वरूपम् ॥' -~-ध्वन्यालोक (१७)