पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१४७

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काव्य के वयं--रौद्र अश्रु भी लीजिए :- 'बहु बिधि सोचत सोच-विमोचन | ववत सलिल राजिवदल-लोचन ॥' __-रामचरितमानस (लङ्काकाण्ड) गद्य में भी करुण के बड़े सुन्दर उदाहरण मिलते हैं। रोहिताश्व के शव- दाह के समय शैव्या कहती है :- ____.. हाय ! जिन हाथों से मीठी-मीठी थपकियाँ देकर रोज सुलाती थी, उन्हीं हाथों से बाज इस धधकती चिता पर कैसे रक्खू गी जिसके मुख में छाले पड़ने के भय से कभी मैंने गरम दूध भी नहीं पिलाया उसे हाय !...... -सत्य हरिश्चन्द्र (चतुर्थ अङ्क) इसमें भी स्मृति सञ्चारी के साथ विषाद भी है । रौद्र:- प्रतिकूलेषु तेचण्यस्यावबोधः क्रोध इप्यते ।। . -साहित्यदर्पण ( ३११७७ ) इसका स्थायी भाव क्रोध है। अपने से प्रतिकूल विषय में तीक्ष्णता का अनुभव क्रोध कहलाता है । जिससे अपना अनिष्ट हो या जो कार्य में बाधक हो वही प्रतिकूल कहलाता है । इष्ट-सिद्धि में किसी प्रकार का विरोध क्रोध का कारण होता है । क्रोध ही परिपक्व होकर रौद्र रस बनता है :- 'बिधि असाध-अपराध करि, उपजायत जिय क्रोध । होत क्रोध बढ़ि रौद्र रस, जहँ बहु आद-विरोध ॥' --देवकृत शब्दरसायन ( चतुर्थ प्रकाश, पृष्ठ ४१) क्रोध का पालम्बन अनिष्ट करने वाला या अनुचित बात कहने वाला पुरुष होता है। उसकी चेष्टाएँ या उक्तियाँ ( जैसे परशुराम-संवाद में लक्ष्मणजी की ) उद्दीपन होती हैं । बिगड़ी हुई वस्तु भी उद्दीपन का काम देती है। दाँत पीसना, मुट्ठी दिखाना, मुंह लाल हो जाना, प्रात्म-प्रशंसा, हथियार चलाना आदि अनुभाव हैं और उग्रता, आवेग, मद, मोह, अमर्ष आदि सञ्चारी हैं। ____ करुण में भी अनिष्ट होता है किन्तु करुण में अनिष्टकारक ऐसा होता है कि जिससे वश नहीं चलता है, जिससे बदला लिया जा सकता है । वीर और रौद्र में इस बात का अन्तर है । वीर में प्रसन्नता और धैर्य रहता है किन्तु रौद्र में विषाद और चञ्चलता । क्रोध के अनुभावों में आत्म-प्रशंसा और अस्त्रों का दिखलाना भी है। उनके उदाहरण रामचरितमानस से दिये जाते हैं लीजिये :- 'बालब्रह्मचारी अतिकोही । बिस्व विदित क्षत्रिय-कुल-द्रोही ।। भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही । विपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही ॥