पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१४९

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काव्य के घl-भयानक 'सभय घिलोके लोग सब, जानि जानकी भीरु । हृदय न हर्ष विषादु, कछु बोले श्री रघुवीरु ।। नाथ संभु-धनु-भंजनिहारा । हुइहि कोउ एक दास तुम्हारा ।।' -रामचरितमानस (बालकाण्ड) भयानक:-- 'घोर सत्रु देखे-सुने, करि अपराध, अनीति । मिले सत्रु , भूतादि, ग्रह, सुमिरे उपजत भीति ।। भीति बढ़े रस भयानक, दृग-जल बेपथु-अंग । चकित चित,चिंता, चपत, विवरनता,स्वर-भंग॥ -देवकृत शब्दरसायन (चतुर्थ प्रकाश, पृष्ठ ४३) अनिष्ट की सम्भावना देखने से. चित्त में विकलता उत्पन्न होती है, वह भय कहलाता है । साहित्यदर्पण में भय का लक्षण इस प्रकार दिया ह :- 'रौद्र शक्त्या तु जनितं चित्तवैक्लव्यजं भयम्' -साहित्यदर्पण (३।१७८। यही इसका स्थायी भाव है । वीर और रौद्र में प्राश्रय अपनी हीनता का अनुभव नहीं करता है किन्तु भय में वह अपनी हीनता का अनुभव करता है । करुण में अनिष्ट हो ही जाता है । भय में अनिष्ट होने की प्रबल सम्भावना रहती है। रौद्र और वीर में आश्रय अनिष्टकारी को भगा देना चाहता है, भयानक में आश्रय खुद भागना चाहता है । वीभत्स में भी प्राश्रय कभी-कभो स्वयं भागना चाहता है किन्तु अपनी हीनता के कारण नहीं वरन् आलम्बन की असह्य हीनता के कारण । अद्भत में भी आश्रय अपनी हीनता का अनुभव करता है किन्तु प्रसन्नता के साथ और उसके सामने से भागना नहीं चाहता है । अद्भत में पालम्बन में लोकोत्तरता रहती है, उसके कार्यों की प्राश्रय व्याख्या नहीं कर पाता। भयानक वस्तु की चेष्टाएँ, अन्धका: आदि भयानकरस के उद्दीपन होते हैं। विवर्णता ( मुंह उतर जाना ), गद्गद् स्वर-भाषण, प्रलय, स्वेद, रोमाञ्च, कम्प, इधर-उधर देखना आदि ( इस सम्बन्ध में रस और मनो- विज्ञान शीर्षक लेख पढ़िए ) अनुभाव हैं । जुगुप्सा, आवेग, मोह, त्रास, ग्लानि, दीनता आदि सञ्चारी हैं। ____श्मशान में रात्रि की भयानकता का दृश्य हम को 'सत्य हरिश्चन्द्र' में मिलता है , इसमें हमको भयानक के उद्दीपन बड़े उग्न रूप में दिखाई पड़ते हैं :-