पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१५१

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काव्य के वर्ण्य--वीभत्स मिलती है कि ये वर्णन किसी व्यक्ति-विशेष से सम्बन्धित नहीं रहते जिससे कि हमको उसकी या अपनी हानि की आशङ्का हो । हमको यह भी न भूलना चाहिए कि यह वर्णन-मात्र है, पिंजड़े से भागा हुया शेर हमसे बहुत दूर है, हमारा बाल भी बाँका नहीं कर सकता, न लङ्का की आग हमको झुलसा सकती है और न उसके किसी स्फुलिङ्ग के हमारे छप्पर पर गिरने का डर है। हम निर्भय होकर भयानकरस के वर्णन पढ़ते हैं। इसके अतिरिक्त हमको भय की दशा में मानव-स्वभाव का अध्ययन करने को मिलता है, हमारी सहानुभूति जाग्रत होती है और एक प्रकार से हम अपनी आत्मा के विस्तार का अनुभव करने लगते हैं । इसी के साथ हमको इस बात की भी प्रसन्नता होती है कि हमारे कवि ने परिस्थिति को किस पूर्णता के साथ अपनी लेखनी के वश में किया है । जो सरकस के शेर के देखने में प्रसन्नता होती है वही 'मालती- माधव' के पिंजड़े से भागे हुए शेर के दर्शन में । यही बात और भी दुःखद अनुभवों पर आश्रित रसों पर (जैसे करुण, रौद्र, बीभत्स) लागू होती है। . वीभत्स :-इसका स्थायी भाव घृणा है । घृणा या जुगुप्सा का साहित्य- दर्पण में लक्षण इस प्रकार दिया है :- ___ 'दोषेक्षणादिभिर्गो जुगुप्सा विस्मयोद्भवा' । -..साहित्यदर्पण (३।१७६) __ घिनौने दृश्य इसके आलम्बन हैं। उसमें कृमि, मक्खियाँ, दुर्गन्ध आदि उद्दीपन हैं। मोह, अपस्मार, व्याधि आदि सञ्चारी हैं; थूकना, नाक सिकोड़ना, मुंह फेर लेना, आँख मीच लेना आदि इसके अनुभाव हैं। देवजी ने वीभत्स का इस प्रकार लक्षण दिया है :--- ____ 'बस्तु घिनौनी देखि सुनि, घिन उपज, जिय माँहि । घिन बादै वीभत्स-रस, चित्त की रुचि मिटि जाहि ॥' . -देवकृत शब्दरसायन (चतुर्थं प्रकाश, पृष्ठ ४३) संसार से वैराग्य उत्पन्न करने के कारण यह शान्तरस का सहायक होता है । जहाँ पर संसार से घृणा. विवेक के कारण होती है वहाँ पर जुगुप्सा, विवेकजा कहलाती है और जहाँ साधारण रूप से होती है वहाँ प्रायकी कह- लाती है । वीभत्स के लिए यह आवश्यक नहीं कि माँस और कृमि का ही वर्णन हो वरन् यदि कोई नैतिक बुराई भी हो तो वीभत्स का आलम्बन बन जायगी । सुधार के लिए वीभत्स का वर्णन आवश्यक हो जाता है । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का काशी का वर्णन इसी उद्देश्य से किया गया है :--