पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१५५

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काव्य के वर्य-शान्त क्रमशः हास्य, करुण, अद्भुत और भयानक की उत्पत्ति बतलाई है। । इस प्रकार उन्होंने पहले परम्परानुकूल पाठ ही रस माने हैं और निर्वेद को सञ्चारी माना है । सम्भव है नवम रस की बात पीछे से सोची हो या 'अन्य किसी द्वारा बढ़ाई गई हो। ____ शान्त के रसों में स्थान दिये जाने के सम्बन्ध में साहित्यदर्पण में कहा गया है कि जहाँ न सुख हो, न दुःख हो, न चिन्ता हो; न द्वेष हो, न राग हो, न कोई इच्छा हो :- 'न यत्र दुःखं न सुखं न चिन्ता न द्वपरागौ न च काचिदिच्छा। .. रसः स शान्तः कथितो मुनीन्द्रः सर्वेषु भावेषु सम प्रमाणः ॥' .. -साहित्यदर्पण (३।२४६ की वृत्ति में उद्धत) एसे स्वरूप वाले शान्तरस में सञ्चारी नहीं हो सकते और वह रस नहीं कहा .. जा सकता। इसके उत्तर में कहा गया है कि तृष्णा के क्षय का सुख सब सुखों से. बढ़कर होता है फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि उसमें सुख नहीं होता है और योगी, मुक्त और वियुक्त को सब तरह का ज्ञान हो सकता है, फिर सञ्चारियों के ज्ञान में क्या बाधा ? यह बात तो पाठ रस माने जाने की परम्परा की ओर संकेत करती है । शान्तरस को रस न मानने के सम्बन्ध में यह भी कहा गया है कि नट में शम की साधना असम्भव है। नट स्वभाव से चञ्चल होता है, उसमें शर्म कहाँ :- 'शान्तस्य शमसाध्यस्वान्नटे च तदसंभवात् । अष्टावेव रसा नाट्ये शान्तस्तत्र न युज्यते ॥' -रसगंगाधर ( पृष्ठ २६) इसी उत्तर में कहा गया है कि नट निर्लिप्त है, जब वह करुण में दुःखी नहीं होता है और रौद्र में गुस्सा नहीं करता है-'कम्चिन्न रसं स्वदते नटः' (सङ्गीत- रत्नाकर)-तब शान्तरस के अभिनय के लिए ही क्यों जरूरी समझा जाय कि वह शान्त रहे । शान्तरस का भी उसके अनुभावों द्वारा ( पद्मासन लगाकर बैठना, नासाग्रदृष्टि करना, प्रसन्नमुद्रा धारण करना ) अभिनय हो सकता है। इसलिए शान्त को काव्यरस ही नहीं, नाट्यरस भी माना जा सकता है। भरतममि द्वारा पहले आठ ही रस गिनाये जाकर पीछे से शान्तरस के उल्लेख होने की एक व्याख्या यह भी हो सकती है कि उन्होंने मूल रस को अलग रखना चाहा हो। रस में जो प्रानन्द रहता है वह शान्तरस का अङ्ग जरूर है किन्तु रौद्र, भयानक आदि में जो क्षोभ और विक्षेप रहता है वह शान्ति के