पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१५६

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१२० सिंद्धान्त और अध्ययन साथ मेल नहीं रखता है । शान्त को हम कठिनता से ही मूल रस मान सकते हैं । थोड़े विचार के साथ उसके स्वतन्त्र रस मानने में विशेष आपत्ति नहीं है । यह बात विवादास्पद अवश्य है कि नट को अभिनीत रस का वास्तविक अनुभव होता है या नहीं । कुछ लोगों का तो कहना है कि सफल नट वही है जो अभिनीत विषय का वास्तविक अनुभव करे । रूस में विशेष 'ओवरउमेगा' एक स्थान है, वहाँ साल में एक बार ईसामसीह के जीवनवृत्त का अभिनय होता है । उन अभिनेताओं के लिए कहा जाता है कि वे अभिनीत विषय का वास्तविक अभि- 'नय करते हैं। इसके विपरीत लोगों का कहना है कि नट वास्तविक दुःख का अनुभव किया करे तो वह पागल हो जाय । इस सम्बन्ध में एक अभिनेता का कथन है कि दूसरों को प्रभावित करने के लिए स्वयं अप्रभावित नहीं दिखाई पड़ना चाहिए ('To move others one should appear not to be unmoved')। लेकिन वास्तविक बात यह है कि यह बात वहुत-कुछ अभिनेता के स्वभाव पर निर्भर रहती है। किन्हीं में मनोवेग के स्रोत बिल्कुल ऊपर होते हैं, जरा-सी बात कहने में वे उबल पड़ते हैं और कुछ में गहरे होते हैं । जब तक निजी दुःख न हो तब तक वे रोते नहीं हैं । जिनमें बुद्धि का प्राधान्य होता है वे अभिनय करते समय निरपेक्ष बने रहते हैं और जिनमें रागात्मकता का प्राधान्य होता है उनका अभिनय वास्तविक हो जाता है किन्तु वे उस वास्त- विकता को एक ही अभिनय में आखीर तक कायम नहीं रख सकते और न रोज-रोज उसको निभा सकते हैं। ___ शम शान्तरस का स्थायी भाव है, उसका साहित्यदर्पण में लक्षण इस प्रकार दिया गया है :-- 'शमो निरीहावस्थायां स्वात्मविश्राम सुखम्' ___-साहित्यदर्पण (३११८०) संसार की निस्सारिता या परमात्मा इसका पालम्बन है। तीर्थ, पुण्याश्रम, . वन, महापुरुषों का सत्सङ्ग इसके उद्दीपन है। रोमाञ्च, अश्रु, पद्मासन लगाकर बैठना प्रादि इसके अनुभाव हैं । निर्वेद, हर्ष, स्मृति, मति, भूत-दया आदि इसके सञ्चारी हैं। ___संसार की असारता की ओर ध्यान आकर्षित कर उससे वैराग्य उत्पन्न करना और जीव को ईश्वरोन्मुख करना शान्तरस के पदों का का मूल उद्देश्य रहता है। एक उदाहरण तुलसी से यहाँ दिया जाता है जिसमें संसार की • निस्सारता पर बल दिया गया है :--..