पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१५८

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सिद्धान्त और अध्ययन भी है कि जो कुछ पवित्र है, शृङ्गार से उपमा देने योग्य है किन्तु शृङ्गार शब्द की व्युत्पत्ति ('शृङ्ग' हि मन्मथो दस्तदागमनहेतुक:'--अर्थात् ङ्ग, मन्मथ या कामदेव को कहते हैं, उसके आगमन का कारण शृङ्गार कहलाता है) में मन्मथ अर्थात् कामदेव शब्द लगा हुआ है, इसलिए वात्सल्यादि को इसके अन्तर्गत करने में थोड़ी बाधा पड़ती है, इसीलिए वैष्णवों ने शृङ्गार को मधुर या माधुर्यरस कहा है। ____ माधुर्य शब्द में शृङ्गार का उज्ज्वल सार प्राजाता है और यह शब्द व्युत्पत्ति की बाधा से मुक्त हो जाता है। वैसे भी शब्दों के व्यवहार में उनका इतिहास कम देखा जाता है। आजकल के मनोवैज्ञानिक वात्सल्य और भक्ति दोनों को ही कामवासना के अन्तर्गत करने में संकोच नहीं करते । भवित को तो वे शृङ्गार का उन्नयन अर्थात् ऊँचा उठा हुअा रूप मानते हैं। वात्सल्य में तो वे शृङ्गार की भी भौतिक प्रसन्नता का पूर्व रूप मानते हैं। भक्ति और वात्सल्य में शृङ्गार-की-सी कोमलता और मधुर चिन्ता अवश्य रहती है। वात्सल्य, भक्ति आदि को भाव मानने या उनको शृङ्गार के अन्तर्गत मानने में उनका पूरा मान नहीं होता। उनके स्थायी भावों में वही कोमलता और तन्मयता है जो और रसों में । वात्सल्य का तो हमारी ही नहीं जाति की रक्षा से सम्बन्ध है । उसका हमारी प्रारम्भिक आवश्यवाताओं से सीधा लगाव है । यह भाव जानवरों में भी होता है, इसलिए इसको स्वतन्त्र रस के रूप में स्वीकार किया है। उसका चमत्कार स्पष्ट है-'स्फुट चमत्कारितया वत्सल च रस विदुः (साहित्यदर्पण, ३१२५१)। ... भक्तिरस को भरतमुनि ने शान्तरस के अन्तर्गत माना है । इसमें बाधा केवल इतनी है कि शान्ति में वैराग्य रहता है और भवित में राग । इस आपत्ति का निराकरण इस प्रकार हो जाता है कि भक्ति में भी सांसारिक विषयों से विराग रहता है । राग केवल सच्चिादानन्द परमात्मा या उसके अवतारों में रहता है । कुछ प्राचार्य देवादिविषयक रति के अन्तर्गत रखकर इसे भाव कहते हैं, यह भक्ति की मर्यादा को घटाना है। भवित में भी शृङ्गार- की-सी ही नहीं वरन् उससे बढ़कर तन्मयता रहती है, इसलिए भक्तों ने उसे स्वतन्त्र स्थान दिया है । वैष्ण वाचार्यों ने भक्ति को मुख्य रस मानकर इसके मुख्य भेदों में शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर (शृङ्गार) को माना है और गौण में हास्य, अद्भुत, बीर,करुणा, रौद्र', भयानक पीर वीभत्स को स्थान दिया है । देश-भक्ति का भी. इतना साहित्य बढ़ता जाता है कि कालान्तर में शायद उसको भी स्वतन्त्र स्थान देना पड़े । आजकल के मनोवैज्ञानिक तो भनित