पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१६२

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१२६ सिद्धान्त और अध्ययन इतनी कहत बज आँखन में श्राय गयो __ भूले राज-काज भौन भीतर को जाइयो ।' ___-लेखक के नवरस में उद्धत (पृष्ठ २८२) इसमें रतिभाव भी है किन्तु ब्रज के प्रति है इस हिसाब से भी यह भाव . देवादिविषयक रति के उदाहरणों की कमी नहीं है किन्तु इस रति को भक्तिरूप से स्वतन्त्र स्थान ही देना अच्छा है। दरबारों में जो राजाविषयक रति चाटुकारिता के रूप में दिखाई जाती है, उसे यदि भाव कहें तो कोई बुराई नहीं है। इसीलिए तो गोस्वामीजी ने कह दिया था :- 'कीन्हें प्राकृत जन गुण गाना । सिर धुनि गिरा लागि पछिताना ॥' -रामचरितमानस (बालकाण्ड) उद्बुद्ध-मात्र स्थायी माव :-इसका उदाहरण नीचे दिया जाता है :---- 'कोसलराज के काज हौं अाज त्रिकूट उपारि, लै बारिधि बोरौं । महा भुजदण्ड कै अंडकटाह चपेट की चोट चटाक दै फोरौं ॥ श्रायसभंग तें जो न डरौं, सब मीजि सभासद सोनित घोरौं । बालि को बालक जौ 'तुलसी' दसह मुख के रन में रद तोरौं ।' ~ कवितावली (लकाकाण्ड) . इसमें आयसु-भङ्ग की आशंका के कारण उत्साह की पूर्णता में कमी प्रा जाती है । भाव ही रह जाता है, रस नहीं बनता। ___ रसाभाव और भावाभास :--जो वस्तु जहाँ न हो वहाँ उसे मान लेना आभास कहलाता है । अनौचित्य के कारण रस विरस हो जाता है, इसीलिए वह रसाभास कहलाता है ( 'अनुचित है रस भाव तहँ से कहिये अाभास')। इस. औचित्य-निर्णय में रागात्मक तत्त्व के साथ बुद्धितत्त्व लग जाता है। आनन्दवर्द्धन ने कहा है कि अनौचित्य से बढ़कर रसभङ्ग का कोई कारण नहीं होता है । औचित्य के समावेश ही में रस का रहस्य है :---- 'श्रनौचित्याहते नान्यद्, रसभङ्गस्य कारणम् । प्रसिद्धौचित्यबन्धस्तु रसस्योपनिषत्परा ॥' व्यक्तिविवेक (पृष्ठ १३३) वैसे तो औचित्य में अलङ्कार, रीति आदि सभी पाजाते है किन्तु रसागास के सम्बन्ध में पालम्बन और पाश्रयों के नौचित्य पर ही अधिया बल दिया गया है। अभिनवगुप्त ने कवि की रसिकता विभावादि के पौचित्य में ही मानी है :-..-.