पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१६३

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काव्य के वर्ण्य-भाव ___ 'विभावाद्यौचित्येन विना का रसवत्ता कवेरिति ।' शृङ्गार का अनौचित्य :--- निम्नोल्लिखित प्रकार की रतियाँ शृङ्गाररस का प्रभास कही जायेंगी । उपनायकविषयक, मुनिविषयक, गुरु-पत्नीविषयक, ( जैसी चन्द्रमा की वृहस्पति की पत्नी में), बहुनायकविषयक, अनुभयनिष्ठ ( जो एक अोर से ही हो ), प्रतिनायकनिष्ठ, अधम पात्र अथवा तिर्यग् योनिनिष्ठ । अन्य अनौचित्य :- गुरुजनों और वृद्धों के प्रति हँसी और क्रोध, हास्य तथा रौद्र का रसाभास होगा । इसी प्रकार अशक्त, शस्त्रहीन, स्त्री ( ताड़का- बध के लिए श्रीरामचन्द्रजी को दोष ही दिया जाता है ) और सज्जन के प्रति वीरता दिखाना वीररस का आभास होगा ( भरतजी के आगमन पर लक्ष्मणजी का लड़ने को तैयार हो जाना वीररस का आभास था, रामचन्द्र जी को सम- झाना पड़ा ( 'लखन तुम्हार सपथ पितु श्राना । सुचि सुबन्धु नहिं भरत समाना' ) श्रेष्ठ पात्र में भय का दिखाना भयानकरस का आभास होगा। हमारे यहाँ के प्राचार्यों ने औचित्य और शालीनता का हमेशा ध्यान रक्खा है। इसी प्रकार लज्जा, क्रोधादि भावों का भी प्राभास होता है। व्यर्थ क्रोध ( अपुष्ट क्रोध ) का उदाहरण दासजी से यहाँ दिया जाता है। इस दोहे में क्रोध और शङ्का व्यर्थ थी :- __'दरपन में निज छाँह सँग, लखि प्रीतम की छाँह । खरी ललाई रोस की, ल्याई अँखियन माँह ॥' -भिखारीदासकृत काव्यनिर्णय (रसाङ्ग-वर्णन, २४) विजयी राजा के प्रति विजित की चाटुकारिता भावाभास होगा । ___ मावशान्ति, भावोदय, भावसंधि और भावशवलता :- भाव-जगत बड़ा संकुल माना गया है। कभी एक भाव की चमत्कारपूर्ण शान्ति हो जाती है, कहीं पर चमत्कार के साथ दूसरे भाव का उदय होता है और कभी दो भाव मिल जाते हैं । ये भाव एक साथ रहकर भाव के आश्रय को दोनों ओर खोंचते हैं । अन्तर्द्वन्द्व ग्रादि शब्द पाश्चात्य प्रभाव से आए हुए बतलाये जाते हैं किन्तु सन्धि भी अन्तर्द्वन्द्व का रूपान्तर है, अन्तर केवल मनोवृत्तियों का है । पाश्चात्य देशों की मनोवृत्ति संघर्षमय है, इसीलिए वे अन्तर्द्वन्द्व (Internal Conflict) की बात कहते हैं। भारतीय मनोवृत्ति शान्तिमय है, इसलिए उसे वे भावसन्धि कहते है। जहाँ कई भाव एक-दूसरे के बाद उदय और शान्त होते रहते हैं वहाँ शवलता का उदाहरण उपस्थित होता है। भावसन्धि में केवल दो ही भाव होते हैं और एक साथ होते हैं । भावशवलता में कई भाव