पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१६४

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१२८ सिद्धान्त और अध्ययन होते हैं और क्रमश: पाते हैं । कुछ लोग बहुत भावों के एक साथ आने को ही शवलता कहते हैं । भावशान्ति और भावोदय सापेक्ष शब्द है। एक भाव की शान्ति दूसरे भाव के उदय से ही होती है किन्तु जहाँ शान्ति का अधिक महत्त्व होता है वहाँ भावशान्ति कहलाती है नीर जहाँ भाव के उदय का महत्त्व होता है वहाँ भावोदय होता है। जब लक्ष्मणजी के शक्ति लगी थी उस समय विषाद का भाव छाया हुश्रा था। श्रीरामचन्द्रजी विलाप कर रहे थे किन्तु हनुमानजी के आजाने से वह भाव एक साथ शान्त हो गया। वहाँ पर उस भाव की शान्ति में एक प्रकार का सुख मिलता है :- 'प्रभुबिलाप सुनि कान, बिकल भये बानरनिकर । प्राह गयउ हनुमान, जिमि करुना महं बीर रस ॥' -रामचरितमानस (लङ्काकाण्ड) भावोदय :-जहाँ पर नए भाव का उदय ही अभीष्ट हो वहाँ वही चमत्कारिक समझा जायगा और भावोदय का उदाहरण होगा। चक्रव्यूह के समय अर्जुन के न होने से पाण्डवों में निराशा का भाव छाया हुआ था । स्वयं अभिमन्यु भी हताश हो रहे थे-~~'हिम्मत हराम है हतास हिय हारि रहे, सोचत उदास उत्तरेल र सकाये से...किन्तु अभिमन्यु को गर्भ में से सुनी हुई चक्रव्यूह की बात याद अाजाने से उसमें एक नये उत्साह की जागति होती है, यह भावोदय का अच्छा उदाहरण है :- 'आई ब्यूह-भेदन-क्रिया की सुधि ज्यौं हो किन्तु, गर्भ माँहि अर्भक-दसा की बुधि जागी है। 'सरस' कहै, स्यौं सब्यसाँची-सुत श्रानन पै, और श्रीप आई जो कछूक कोप-पागी है।' नयन-सरोजनि में पायो नयो रङ्ग, अंग- श्रीजनि समायो, चित्त-चिन्ता सब भागी है। थरकन लागी रद-कोर कुटिल हैं . होय, भौंहैं दोय, बीर-बाहु फरकन लागी है।' ___ रामचन्द्रशुक्ल 'सरस' रचित अभिमन्यु-बध (पृष्ठ ४) ___ यहाँ पर नये जाग्नत भाव उत्साह को अधिक महत्त्व मिला है, वीर में रौद्र सहायक रूप से मिला हुआ है। भावसन्धिः---जहाँ समान बल वाले दो भाव पाकर मिल जाय वहाँ