पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१७

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मार्ग से कुछ भिन्न होता है । उसकी शब्दावली में कल्पना का पुट लगा रहता है । वह 'कमल' को 'कमल' न' कहकर 'सरसी के नेत्र' · कहेगा । 'उषा' को 'उषा' न कहकर 'भगवान के चरणों की लाली' कहेगा । इसीलिए उसने वक्रता को 'वैचित्र्य' तथा 'वैदग्ध्यभङ्गीभणिति' अर्थात् विदग्ध (Cultured) लोगों के कहने का विशेष ढंग भी कहा है । बाउनिङ्ग (Browning) ने भी एक जगह कहा है-'Art may tell a truth obliquely.' .. वक्रोक्ति को व्यापक बनाने के लिए कुन्तल ने ६ प्रकार की वक्रोति मानी हैं--(१) वर्णविन्यास-वक्रता, (२) पदपूर्वार्द्ध-वक्रता, (३) परार्द्ध-वक्रता, (४) वाक्य-वता (वाक्य-वक्रता के अन्तर्गत उसने अलङ्कारों को माना है । और प्रेयस तथा उर्जस्विन् अलङ्कारों के अन्तर्गत रस को माना है किन्तु रस को प्रधानता न देते हुए भी रस को नितान्त गौण नहीं माना है। रसवत् को अलङ्कार की अपेक्षा अलङ्कार्य अधिक माना है।), (५) प्रकरण-वक्रता, (६) प्रबन्ध-वक्रता । कवि लोग जो अपनी कल्पना से इतिवृत्त में हेर-फेर कर उसे सरसता प्रदान करते हैं वे कवि-कर्म (५) और (६) के अन्तर्गत पाते हैं। राजेश्वर (१०वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में) ने अपनी 'काव्य-मीमांसा, म कवि-शिक्षा को अपनी विवेचना का मुख्य विषय बनाया है । डाक्टर गङ्गानाथ झा का 'कवि-रहस्य' नाम का ग्रन्थ उसी के आधार पर राजेश्वर और क्षेमेन्द्र लिखा गया है। उसमें कवि और भावक दोनों के ': - . अच्छे वर्गीकरण किये गये हैं और कवियों के लिए बहुत- सी ज्ञातव्य, बातें बतलाई हैं। प्राचार्य क्षेमेन्द्र (११वीं शताब्दी) ने औचित्य को प्रधानता दी है और इस सिद्धान्त को पद, वाक्य, प्रबन्धार्थ, गुण, अलङ्कार, रस, क्रिया आदि पर लागू कर उसको व्यापक बनाया । 'औचित्य-विचार-चर्चा, इनका प्रमुख ग्रन्थ है। ... पण्डितराज जगन्नाथ :-'रसगङ्गाधरकार' पण्डितराज जगन्नाथ ( १७वीं शताब्दी ) आचार्य और कवि दोनों ही थे। इन्होंने काव्य को 'रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः ( काव्यमाला, पृष्ठ ४ ) कहा है । ये श्राह्लाद के साथ-साथ चमत्कार को भी महत्त्व देते हैं और लौकिक वर्णन में (जैसे तुम्हारे पुत्र हुआ है या पेड़ पर पक्षी बैठा है ) कोई चमत्कार नहीं मानते । १. 'याक्यस्य वक्रभावोऽन्यो भिद्यते : सहस्रधा । ... यत्रालङ्कारवर्गोऽसौ सर्बो ऽप्यन्तर्भविष्यति ॥' . :::........--वक्रोक्तिजीवित (१॥२१)