पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१७२

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१३६ सिद्धान्त और अध्ययन ___इस उद्धरण में वीर के साथ भयानक और वीभत्स आये हैं । 'अलक्षिणी', 'ग्राततायिनी' प्रादि वीभत्स के ही पालम्बन हैं। . साम्य-विवक्षा अर्थात् समानतापूर्वक वर्णन की इच्छा से ( उपमान-उपमेय- रूप से ) विरोधी रसों का वर्णन दोषयुक्त नहीं कहलाता है। इसका उदाह- रण काव्यप्रकाश में इस प्रकार दिया गया है :--- 'दन्तक्षतानि करजैश्च विपाटितानि प्रोदिन्नसान्द्रपुलकेभवतः शरीरे । दत्तानि रक्तमनसा मृगराजवध्वा जातस्प हैमुनिभिरप्यवलोकितानि ।।' -काव्यप्रकाश ( ७१६५ का उदाहरण ३३७) हे जिनराज, आपके घने रोमाञ्चपूर्ण शरीर में सिंहनी के रक्त-लाभ की इच्छा से नखः और दन्तों द्वारा किये हुए घावों को मुनि लोग भी बड़ी लालसा से देखते हैं । यहाँ पर नख और दन्त-क्षतों को शृङ्गारिक चित्रावली व्यजित कर शान्तरस में शृङ्गार का उपमानरूप से वर्णन किया गया है। यह वर्णन उद्दीपनों की समानता पर किया गया है । भिखरीदासजी के काव्यनिर्णय से एक . उदाहरण दिया जाता है :-- 'भक्ति तिहारी यों बसै, मो मन में श्रीराम । बसै कामिजन हियनि, ज्यों परम सन्दरी बाम ॥' -भिखारीदासकृत काव्यनिर्णय (रसदोष-वर्णन १८) दूसरे भाव या रस के अङ्गरूप से विरोधी रसों का वर्णन दोष का कारण नहीं होता है । यद्यपि अाजकल बैरियों की हीनता और विशेषकर उनकी स्त्रियों की भयाकुल अवस्था का वर्णन करना मानवता और शिष्टता के विरुद्ध समझा जाता है तथापि एक साहित्यिक सिद्धान्त के निरूपण में उसे दे देना अनुचित न होगा । महाराज हिन्दूपति के बैरियों की स्त्रियों का दावाग्निपूर्ण कण्टकाकीर्ण बनों में विचरने का वर्णन देखिए :--- . 'वैलिन के विमल बितान तनि रहे जहाँ, द्विजन को सोर कछू कहो ना परत है ता बन दवागिनि की धूमनि सों नन सुकतावलि सुबारे डार फूलन करत है ।। फेरि फेरि गुठो छुपायें मिसु कंटनि के, फेरि फेरि आगे पीछे भाँवर भरत है । हिन्दूपति जू सों बच्यो पाइ निज नाहैं बैरिबनिता उछाहै मानि ब्याह सों करत है।' भिखारीदासकृत काव्यनिर्णय (रसदोष वर्णन १७) उपर्युक्त छन्द भिखारीदासजी ने काव्यप्रकाश के 'कामस्य क्षप्तकोमलांगु- लिगलग सदर्भाः स्थली' (काव्यप्रकाश, ७।६५ का उदाहरण ३३८ ) से शुरू होने वाले उदाहरण के अनुकरण में लिखा है। इसमें भयानक और शृंङ्गार कुछ-कुछ उपमानोपमेयरूप से राजाविषयक रति-भाव के अङ्ग होकर