पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१७४

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६ : रस और मनोविज्ञान रस का विवेचन पहले-पहल नाटकों के सम्बन्ध में भरत मुनि द्वारा हुला है । हमारे यहाँ नाटक मनुष्य की क्रियानों की अनुकृति नहीं हैं वरन् उनके द्वारा भावों की अनुकृति है । इसी सम्बन्ध में भरतमुनि विवेचन का ने अपने नाट्यशास्त्र में भावों और रसों का विशद विवे- आधार चन किया है । रस का प्रश्न काव्य की आत्मा के सम्बन्ध में भी उठाया गया है । आचार्य विश्वनाथ ने 'वाक्य रसात्मकं काव्यम्' कहकर रस को काव्य की आत्मा माना है। . हमारे जीवन में भावों और मनोवेगों (Feelings and Emotions) का विशेष स्थान है । सुख और दुःख को हम भाव कहते हैं । रति, उत्साह, भय, क्रोध, घृणा, विस्मय आदि मनोवेग है । मनोवेग भाव और मनोवेग सुखात्मक भी होते हैं और दुःखात्मक भी । रति, उत्साह सुखात्मक हैं और भय, क्रोध आदि दुःखात्मक हैं । बहुत ऊँचे त्रिगुणातीत क्षेत्र में पहुँचे हुए लोगों को दृष्टि में ये मनोवेग तुन्त और राग-द्वेष की संज्ञा में गिने जाकर चाहे हेय समझे जाय किन्तु साधारण लोक- जीवन के व्यावहारिक धरातल में ये हमारी ज्ञानात्मक और क्रियात्मक वृत्तियों को हलका या गहरा रङ्ग देकर उनमें एक निजत्व उत्पन्न करते हैं। हमको दुःख या सुख पहुँचाने के कारण ही संसार की वस्तुएँ हेय या उपादेय बनती हैं। हमारे मनोवेग चरित्र के विधायक और परिचायक होते हैं। वे हमारी क्रियाओं के प्रेरक चाहे न हों किन्तु उनको शक्ति और गति अवश्य देते हैं। इनमें हमारे व्यक्तित्व की छाप दिखाई पड़ती है। ___साहित्य के भाव मनोविज्ञान के भावों से भिन्न होते हैं । ये भाव मन के उस विकार को कहते हैं जिसमें सुख-दुःखात्मक अनुभव के साथ कुछ क्रिया- त्मक प्रवृत्ति भी रहती है। यह मनोवेग का एक व्यापक रूप होता है जिसमें हलके और गहरे, मन्दं और तीन सभी प्रकार के भाव शामिल रहते हैं। इसकी व्यापकता में भाव का क्रियात्मक पक्ष भी वर्तमान रहता है । अनुभाव भी तो भाव ही कहलाते हैं। . इन भावों और मनोवेगों का अध्ययन मनोविज्ञान का विषय है । प्राचीन भारतवर्ष में आजकल-का-सा ज्ञान का विशेषीकरण न था, शायद इसलिए