पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१७५

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रस और मनोविज्ञान-साधारणीकरण द्वारा दुःख में सुख कि वे लोग ज्ञान की भिन्न-भिन्न शाखाओं के परस्पर-सम्बन्ध को स्थापित रखने में अधिक विश्वास रखते थे। उनके लिए ज्ञान एक अखण्ड वस्तु थी। वे उसे संश्लिष्ट रूप में ही देखना चाहते थे । यद्यपि प्राचीन वाङमय में मनोविज्ञान नाम का कोई विशेष शास्त्र न था तथापि योग, न्याय आदि दर्शनों में तथा साहित्य-शास्त्र में मनोविज्ञान-सम्बन्धी प्रचुर सामग्री मिलती है । साहित्य में भावात्मक या रागात्मक तत्त्व की प्रधानता होने के कारण उस पर प्रकाश डालने वाले काव्य की आत्मा रस के निरूपण में मनोवेगों से सम्बन्ध रखने वाली बहुत-कुछ सामग्री उपलब्ध हो सकती है। रस मनोवेग नहीं वरन् वह मनोवेगों का प्रास्वादन है । जिस प्रकार आस्वादनकर्ता को आस्वाद्य वस्तु के सम्बन्ध में कुछ जानकारी भी प्राप्त हो जाती है (वह वस्तु कहाँ और कैसे उत्पन्न होती है), उसी प्रकार रस के विवेचन में मनोवेगों का विश्लेषण मिलता है । हमारे मनोवेग लौकिक अनुभव का विषय हैं किन्तु जब वे साहित्यिक देव- ताओं के सामने प्रास्वादन के लिए रक्खे जाते हैं तब उनका पूजा की धूप या भपके में खिचे हुए अर्क की भांति एक दिव्य सौरभ- साधारणीकरण मय रूप हो जाता है । साहित्य-जगत में हम भी देवताओं द्वारा दुःख की भाँति भावना के ही भूखे रहते हैं। हम संसार में . में सुख रहते हुए भी उससे ऊपर उठ जाते हैं। हम 'श्रय निजः परो वा' की क्षुद्र व्यक्तित्व वाली संकुचित मनो- वृत्ति से परे दिखाई देते हैं और हमारे आस्वादित मनोवेगों की कटुता, तीव्रता, तीक्ष्णता, रुक्षता, शुष्कता और स्थूलता जाती रहती है। निजत्व की भावना ही तो सुख-दुःख की धार को पैनी कर देती है। कुशल पाक-शास्त्री आक और नीम के पत्तों को भी सुस्वादु बना देता है । कवि की 'ह्लादैकमयी' दिव्य वाणी का पारस-स्पर्श प्राप्तकर हमारे लौहसदृश कठोर और दुःखद मनो- वेग भी आनन्दमय स्वर्ण का रूप धारण कर लेते हैं। यह है विभावन या साधारणीकरण की रसायन, जिसके द्वारा मनोवेगों से 'ममेति वा परस्येति' अपने-पराये का क्षुद्रत्व दूर कर दिया जाता है । दुःख का कारण तो ममत्व ही होता है । ममत्व से ऊपर उठा हुआ ब्रह्म- ज्ञानी दुःख-सुख का अनुभव नहीं करता । जहाँ हम ममत्व से परे हुए वहाँ रस-दशा को प्राप्त होते हैं। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की उदार मनोवृत्ति का परिचय साहित्य में ही मिलता है । दूसरे के अनुभव को अपना बनाना ही करुणा का मूल सिद्धान्त है। इसी को सहानुभूति कहते हैं, शायद इसीलिए महाकवि