पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१८१

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रस और मनोविज्ञान-रस और मनोवेग हमारे मनोविनोद का कारण होता है । श्रीराधाकृष्ण की प्रेम-लीला के वर्णन में उपयुक्त वातावरण अपेक्षित रहता है । वृन्दारण्य, चन्द्र-ज्योत्स्ना-धीत-धवल यमुना-पुलिन, चन्दन-चोबा से सुवासित शीतल-मन्द · समीर, वंशी-निनाद, हासोल्लास, ये सब मिलकर प्रेम की अभिव्यक्ति में योग देते हैं, इनके स्थान में यदि नीचे भूभल और ऊपर घाम हो, चारों ओर लू चपेटा मार रही हो तो रति-भाव यदि काफूर न हो जाय तो मन्द अवश्य पड़ जायगा। यदि उद्दीपन विभाव न हो तो स्थायी भाव शीघ्र ही शान्त हो जायगा। पालम्बन की निष्क्रिय उपस्थिति से जी न ऊब जाय इसी से उसकी चेष्टानों को उद्दीपन माना है। रसको उद्दीप्त रखने में देशकाल के साथ इनका भी महत्त्व है : " . 'उहीपनविभावास्ते रसमुद्दीपयन्ति ये ।":...., . ..'पालम्बनस्य चेष्टाद्या देशकालादयस्तथा।।' -साहित्यदर्पण (३११३१, १३२ ) परशुरामजी का क्रोध शीघ्र ही शान्त हो जाता यदि लक्ष्मणजी की गर्वोक्तियाँ उनको उत्तेजित न करती रहतीं। श्रीकृष्णजी का हँसना, किलकना, दौड़ना, गिर पड़ना, ये सब यशोदा के लिए उद्दीपन होंगे। हमारे यहाँ के प्राचार्यों ने उद्दीपन विभावों को रस-सामग्री में मानकर परिस्थिति की संश्लिष्टता पर अधिक ध्यान रक्खा है । वास्तव में चेष्टादि के उद्दीपन, पालम्बन से उसी भाँति अलग नहीं किये जा सकते, जिस प्रकार विल्ली की 'म्याऊँ' बिल्ली से । अन्तर केवल इतना ही है कि आलम्बन में अपेक्षाकृत स्थायित्व है । तरङ्ग समुद्र की होती है, तरङ्ग का समुद्र नहीं है। हमारे यहाँ के प्राचार्यों ने परिस्थिति का पूर्ण वर्णन किया है। . · विभावों के वर्णन में मालम्बन के साथ माश्रय का भी वर्णन प्राजाता है। जिसमें भाव की उत्पत्ति हो उसे आश्रय कहते हैं, जैसे लक्ष्मणजी को देख- कर यदि परशुरामजी को क्रोध आता है तो परशरामजी । आश्रय कहलायेंगे। पाश्रय के वर्णन के बिना भावपक्ष अपुष्ट रहेगा । कवि-कर्म में भाव और विभाव- पक्ष दोनों का ही वर्णन आवश्यक है। २. मनोवेगों का गुण :--- इसके सम्बन्ध में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि रस-शास्त्र के प्राचार्यों ने मनोवेगों या स्थायीभावों को केवल दुःखात्मक या सुखात्मक ही नहीं कहा है वरन् उस सुख-दुःख का प्रकार भी बतला दिया. है। शृङ्गार के स्थायी भाव प्रम को सुखात्मक कहा है-.-मनोनुकूलेपवर्थ पु सुखसंवेदनं रतिः' (काच्यादीप, पृष्ठ ७५), हास में चित्त का विकास बतलाया गया है-'न्यापीड़ादिभिश्चेतीविकासो हास उच्चते' (काव्यप्रदीप, पृष्ठ ८०),