पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१८३

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रस और मनोविज्ञान-रस और मनोवेग १४७ तन गोपन, घमनी, शरण, चाह आदि किय टेरि ।।' -लेखक के नवरस में उद्धत (पृष्ठ ४८७) भय का भागने और छिपने की सहज प्रवृत्तियों से सम्बन्ध है, वे दोनों इसमें आगई हैं । भागने के साथ पीछे मुड़कर देखना भय की अवस्था में स्वा- भाविक ही है । अब जरा डार्विन का वर्णन पढ़िए :-- The frightened man at first stands like a statue motionless and breathless, or crouches down as if insti- nctively to escape observation. (तनगोपन)...for the skin instantly becomes pale, as during implicit faintness. (मूर्छा और वैवर्ण्य),...That the skin is much affected :under the sense of great fear, we see in the marvellous and inexp. licable manner in which perspiration immediately exudes from it.' (स्वेद). ___...One of the best-marked symptoms is the trembl- ing ( कम्प) of all the muscles of the body, and this is of ten first seen in the lips. From this cause and from the dryness of the mouth, (मुखशोषन, गीता में भी इस अनुभाव का उल्लेख है 'मुखं च परिशुष्यति'),...the voice becomes husky or indistinct, or may altogether fail. ( गद्गद् स्वर )...The uncovered and protruding eye balls are fixed on the object of terror; or they may roll relentlessly from side to side. -Charles Darwin Expression of the Emotions in Man and Animals (Page 307 & 308). ___ भरतमुनि ने जो भय की दृष्टि बतलायी है उसमें यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है :- 'विस्फारितोभयपुटा भयकम्पिततारका । निष्कान्तमध्या दृष्टिस्तु भयभावे भयान्विता ।।' -नाव्यशास्त्र (५८) भयभीत मनुष्य की आँखें खूब खुली रहती हैं । उसकी पुतलियाँ इधर- उधर घूमती हैं और दृष्टि मध्य में नहीं रहती यानी वह सामने नहीं देखता । भयभीत मनुष्य की गति बतलाते हुए भी भरतमुनि ने यही बात कही है :---