पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१८४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


१४८ सिद्धान्त और अध्ययन 'विस्फारिते चले नेने विधुतं च शिरस्तथा । भयसंयुक्तया दृष्ट्या पार्श्वयोश्च विलोकनैः ॥' -नाट्यशास्त्र ( १३।७०) साधारण अनुभावों के साथ सात्विक भाव भी माने गये हैं. जो हैं तो अनुभाव ही किन्तु साधारण से भिन्न हैं। पाश्चात्य प्राचार्यों ने अनुभावों के दो प्रकार माने है---एक तो वे जो बिल्कुल वाहा और प्रत्यक्ष क्रियाओं से सम्बन्ध रखते हैं, जैसे भागना-दौड़ना-लोटना आदि इनका अभिनय सहज में हो जाता है। दूसरे वे हैं जो शरीर के भीतर के अवयवों से सम्बन्ध रखते हैं, जैसे रुधिर की शिरात्रों के संकुचित हो जाने से मुंह का पीला पड़ जाना, मुख का सूख जाना। ये अपने-आप हो जाते हैं, इन पर हमारा अधिक वश नहीं होता, जैसे स्वेद । ऐसे ही अनुभावों को अलग करके उनको सात्विक भाव का नाम दिया गया है । इनका सम्बन्ध प्रायः 'Vasomotor' या 'Sympathetic Nerves' स्वत:चालित संस्थानों (Automatic Systems) से है । वैवी उत्पन्न करने के लिए भरतमुनि ने नाड़ियों का पीड़न या दबाना बतलाया है- 'मुखवर्णपरावृत्या नाड़ीपीड़नयोगत:'-(नाट्यशास्त्र, ७।१०४) । आजकल' के लोग भी नाड़ियों के संकोच ही को इसका कारण मानते हैं। इस विषय में डार्विन का वर्णन पढ़िए :--- __ This paleness of the surface, however, is probably in large. part, or exclusively, due to the Vasonrotor centre being affected in such a manner as to cause the . contraction of the small arteries of the skin.' -Charles Darwin Expression of the Emotions in Man and Animals (Page 307) सात्विक भाव के सम्बन्ध में प्राचार्यों का मतभेद है । साहित्यदर्पणकार ने इनका सम्बन्धं सत्व नाम को आत्मा में विश्राम को प्राप्त होने वाले रस के प्रकाशक अान्तरिक धर्म से माना है-'सत्त्वं नाम स्वात्मविश्रामप्रकाशकारी कश्चनान्तरोधर्मः' ( साहित्यदर्पण, ३१३४ की वृत्ति ) 'दशरूपककार का भी ऐसा ही मत है, उन्होंने सत्व की इस प्रकार परिभाषा दी है :- 'परदुःखहर्षादिभावनायामत्यन्तानुकुलान्तःकरणत्वं = सस्वम्' . -दशरूपक (४।५ की वृत्ति) अर्थात् पराये दुःख और हर्ष की भावनाओं में अन्तःकरण की अत्यधिक अनुकूलता सत्व कहलाती है, इसी से अश्रु-रोमाञ्चादि होते है। रजोगुण और